हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट
15 अप्रैल, 1917 की एक सियाह रात जब पटना से आई एक ट्रेन मुजफ्फरपुर स्टेशन पर रुकी तो राजकुमार शुक्ल के साथ महात्मा गांधी भी ट्रेन से उतरे.

नई दिल्ली/ मुजफ्फरपुर/ हैदराबाद, 18 जून, 2025. मुजफ्फरपुर के एक डिग्री कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर जेबी कृपलानी अपने छात्रों के साथ उनका स्वागत करने रेलवे स्टेशन पर आए हुए थे. जब कृपलानी को गांधी के आने के बारे में टेलीग्राम मिला था, तो उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि इतने बड़े आदमी का स्वागत वो किस तरह से करें. कृपलानी अपनी आत्मकथा ‘ माई टाइम्स, और ऑटोबायोग्राफी ‘ में लिखते हैं, ” दरभंगा के एक ब्राह्मण छात्र ने सलाह दी थी कि इतने बड़े आदमी का स्वागत हिंदू रीति से आरती उतार कर किया जाना चाहिए. ” मैंने वो बात मान ली. छात्रों ने आसपास के बगीचे से बहुत सारे फूल तोड़ डालें. आरती के लिए हर चीज जमा हो गई सिवाय नारियल के. तब तक सारी दुकानें बंद हो चुकी थी. ” उन्होंने लिखा, ” हमारे बगीचे में एक नारियल का पेड़ था. मैं खुद नारियल के पेड़ पर चढ़ा और कई नारियल तोड़कर नीचे उतारा. जब गांधी जी की आरती उतारी गई तो मैंने नोट किया, उनको ये सब रास नहीं आया. “

गांधी का साथ देने की वजह से जेल
कृपलानी आगे लिखते हैं, ” उसी ट्रेन से मेरा एक जमींदार दोस्त भी उतरा. स्टेशन पर उसकी बग्घी उसका इंतजार कर रही थी. मैंने उससे अनुरोध किया कि वो अपनी बग्घी हमें दे दें, ताकि हम उसमें गांधी को बैठाकर ले जा सकें. “जब बग्घी के नजदीक हम पहुंचे, तो हमने देखा कि लड़कों ने उसमें जुते घोड़े हटा दिए हैं और वो उसमें गांधी जी को बैठाकर खुद उसे खींचने के लिए तैयार थे.” जब गांधी जी ने ये देखा, तो वो बोले कि वो इस तरह खुद का लोगों से खींचे जाना पसंद नहीं करेंगे. अगर आप ऐसा करेंगे, तो मैं पैदल ही चलना पसंद करूंगा. मैं लड़कों से कहा कि वो इस पर जोर ना दें. ” गांधी और कृपलानी की जान पहचान काजू सिलसिला यहां से शुरू हुआ, वो आजीवन चला. उन्होंने भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी के उदय को न सिर्फ अपनी आंखों से देखा, बल्कि उसे अनुभव भी किया. कृपलानी का जन्म 11 नवंबर 1888 को सिंध के हैदराबाद शहर में हुआ था, उनकी पढ़ाई कराँची के डीजे सिंध कॉलेज में हुई थी. वहां उन्होंने कालेज के अंग्रेज प्रधानाचार्य के खिलाफ आंदोलन चलाया था, जिसने एक बार कह दिया था कि सभी भारतीय झूठे होते हैं. इस आंदोलन के कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था. बाद में उन्होंने ने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की थी . सन 1912 से 1917 तक उन्होंने मुजफ्फरपुर के डिग्री कॉलेज में अंग्रेजी और इतिहास के प्रोफेसर के तौर पर काम किया. चंपारण आंदोलन में महात्मा गांधी का साथ देने के लिए जेबी कृपलानी पहली बार जेल गए.
महात्मा गांधी के कट्टर समर्थक रहे जेबी कृपलानी
सन 1920 से 1927 तक वो गांधी जी के स्थापित किए हुए गुजरात विद्यापीठ के प्रधानाचार्य रहे. इन्हीं दिनों उनको ” आचार्य ” कहकर पुकारा जाने लगा. सन 1934 में उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया जिस पद पर वो 1945 तक रहे. सन 1946 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन नेहरू से मतभेदों के कारण पहले उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और सन 1951 में कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने किसान मजदूर प्रजा पार्टी का गठन किया, जिसका बाद में सोशलिस्ट पार्टी में विलय हो गया. संविधान सभा के सदस्य रहे आचार्य जेबी कृपलानी ने 1952, 1957, 1963 और 1967 का चुनाव जीता. हालांकि आचार्य कृपलानी बहुत बड़े गांधीवादी थे, लेकिन उन्होंने कभी आंख मूंदकर गांधी का अनुसरण नहीं किया. भारत के पूर्व गृह सचिव टीएन चतुर्वेदी कृपलानी की आत्मकथा की भूमिका में लिखते हैं, ” चौरी चौरा कांड के बाद गांधी के असहयोग आंदोलन को वापस लेने के फैसले से वो पूरी तरह सहमत नहीं थे, फिर भी उन्होंने महात्मा गांधी का समर्थन किया, क्योंकि वो उन लोगों के तर्कों से असहमत थे जो गांधी का विरोध कर रहे थे. ” एक बार आचार्य कृपलानी ने गांधी के बारे में कहा था,’ ऐसे शख्स से असहमत होने का क्या फायदा जिसकी सैकड़ो बार परीक्षा ली जा चुकी है और जो हर बार उस परीक्षा में खरा उतरा है.
सुचेता मजूमदार से नहीं चाहते हुए भी विवाह
बार-बार जेल जाने के बावजूद उन्होंने गुजरात विद्यापीठ को अपने बूते पर चलाया. इस संस्था ने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए कई कार्यकर्ता दिए, जिसने कांग्रेस नेतृत्व की दूसरी कतार के नेता तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई . हमेशा गांधी की बात मानने वाले आचार्य कृपलानी ने एक बार उनकी सलाह मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने 1934 में सुचेता मजूमदार से विवाह करने से असहमति जताई थी लेकिन गांधी के कहने पर उन्होंने सुचेता से शादी कर ली. हालांकि सुचिता कृपलानी ताउम्र कांग्रेस पार्टी में बनी रही और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री भी बनी. आचार्य जेबी कृपलानी 1982 में 94 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.