क्या चिराग से डर गए हैं नीतीश? इमोशनल दांव और सियासी जवाब के अंदरखाने की कहानी

हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट
क्या नीतीश कुमार चिराग पासवान की सियासी महत्वाकांक्षा से डरे हुए हैं? यह सवाल बिहार की राजनीति में तब से चर्चा में है जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार दौरे के दौरान नीतीश कुमार और चिराग पासवान की बातचीत हुई है. पीएम के मंच पर हुई इस बातचीत ने बिहार में सियासी हलचल मचा दी है.
पटना/ हैदराबाद, 23 जून, 2025. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार दौरे के दौरान सिवान की जनसभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लोक जनशक्ति पार्टी ( रामविलास ) के नेता चिराग पासवान के बीच हुई बातचीत ने सियासी गलियारों में नए सवाल को जन्म दे दिया है. सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार चिराग पासवान की बढ़ती सियासी महत्वाकांक्षा से डर गए हैं? यह सवाल जमुई के सांसद अरुण भारती की उस जानकारी के साझा करने के बाद उठे हैं जो पीएमसी मंच पर नीतीश कुमार कुमार और चिराग पासवान के बीच बातचीत हुई थी. जमुई सांसद अरुण भारती के मुताबिक, पीएम मोदी के मंच पर नीतीश कुमार ने चिराग पासवान से पूछा, क्या आप वाकई बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं? अगर लड़ते हैं तो कहां से ? इसके बाद सीएम नीतीश ने चिराग पासवान की युवा छवि और केंद्रीय मंत्री के तौर पर उनके उज्जवल भविष्य का हवाला देते हुए सुझाव दिया और यह भी कहा कि उन्हें अभी विधानसभा चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं है. अब सवाल यह उठ रहा है कि नीतीश कुमार ने चिराग पासवान से ऐसा क्यों कहा- क्या नीतीश कुमार वाकई में चिराग पासवान से डर गए हैं ?
सांसद अरुण भारती ने क्या बताया ?
अरुण भारती ने बताया कि सिवान में मंच पर चिराग पासवान से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूछा कि क्या आप वाकई बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं? अगर लड़ते हैं तो कहां से चुनाव लड़ेंगे? अरुण भारती ने बताया कि मुख्यमंत्री ने चिराग पासवान से कहा कि आप युवा है और केंद्रीय मंत्री भी हैं. आपका भविष्य उज्जवल है और आपको अभी चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है? नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि उन्होंने रामविलास पासवान के साथ काम किया है. सीएम नीतीश ने राजगीर में आगामी 29 जून को होने वाले बहुजन भीम समागम की जानकारी ली और कहा कि बिहार की राजनीति में चिराग पासवान की बड़ी भूमिका है. इस पर चिराग पासवान ने कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी उनकी पार्टी की तरफ से चल रही है. अगर पार्टी का आदेश हुआ तो वो आपका आशीर्वाद लेने जरूर आएंगे.
चिराग से नीतीश की गुफ्तगू के मायने समझिए
अब सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार वाकई में चिराग पासवान से डर गए हैं, जो चिराग को बिहार आने से रोकना चाहते हैं, या यह एनडीए के भीतर रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की कवायद है? राजनीति के जानकारों की नजरों से समझे तो इसके कई पहलू है. एक तो चिराग पासवान को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का 2020 वाला बुरा अनुभव है तो दूसरा यह कि आने वाले चुनाव में एनडीए की रणनीतिक कठिनाइयां. तीसरा यह कि चुनाव परिणाम के बाद क्या नीतीश कुमार के नेतृत्व को चुनौती की भी संभावना एनडीए में कहीं निकलकर आ सकती है ?
प्रेशर पॉलिटिक्स और किंग मेकर की महत्वाकांक्षा
दरअसल, चिराग पासवान की राजनीतिक रणनीति 2020 के विधानसभा चुनाव से ही चर्चा में रही है जब उनकी पार्टी ने एनडीए से अलग होकर 137 सीटों पर चुनाव लड़ा और जदयू को 34 सीटों पर नुकसान पहुंचाया था. इसके चलते कभी बिहार की नंबर वन पार्टी जदयू तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. इसके बाद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में लोजपा ( आर ) ने 5 सीटों पर जीत प्राप्त कर अपनी सियासी ताकत दिखाई. वहीं, अब चिराग पासवान 2025 के चुनाव में भी अपनी रणनीति से सबको चौंका रहे हैं. उन्होंने अपने एक बयान में जब यह कह दिया कि वह सभी 343 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं तो एनडीए में खलबली मच गई. हालांकि, बाद में उन्होंने इसे संभालते हुए एनडीए की लड़ाई की बात कही. राजनीति के जानकार कहते हैं कि उनकी यह घोषणा बिहार में 40 विधानसभा सीटों की मांग की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा माना जा रहा है. जाहिर है इसका एक मकसद एनडीए में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और भविष्य में किंगमेकर की भूमिका निभाना है.
बिहार चुनाव को लेकर चिराग पासवान की रणनीति
दरअसल, चिराग पासवान ने अपनी रणनीति को ” बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” के नारे के साथ जोड़ा है जिससे वह दलित और गैर गैर — यादव पिछड़े वर्गों में अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं. उनकी आरा रैली में ” नव संकल्प महासभा” और पटना में कार्यकारिणी बैठक जैसे आयोजनों ने उनकी सियासी सक्रियता दिखाती है कि वह अपने अभियान पर बढ़ चले हैं. दरअसल, चिराग की नजर उन सीटों पर भी है जहां 2020 में उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी . बरहमपुर, दिनारा और रुपौली जैसी कुल 9 सीटें ऐसी हैं जहां चिराग को अपनी पार्टी की जीत संभावित लगती है. स्पष्ट है कि यह रणनीति न केवल उनकी पार्टी को मजबूत करने की है, वाकी नीतीश के प्रभाव को कम करने की भी कोशिश है.
एनडीए गठबंधन में इस मुद्दे पर अंदर ही अंदर टेंशन !
राजनीति के जानकारों की नजर में बिहार एनडीए में बड़ी चुनौती सीट बंटवारे को लेकर है. सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी और जदयू के बीच 100 सीटों पर सहमति बनी है, जबकि बाकी 43 सीटें लोजपा, हम और पासवान की 25 से 35 सीटों की मांग पूरी होगी कि नहीं इसको लेकर भी सवाल है.