
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट
‘जायंट किलर ‘ के नाम से मशहूर और इंदिरा गांधी को चुनावी शिकस्त देने वाले राजनारायण के बारे में कहा जाता है कि अगर वो राजनेता नहीं बने होते तो शायद अपने जमाने के चैंपियन पहलवान होते.
नई दिल्ली/ हैदराबाद, 24 जून, 2025. राज नारायण को इससे कोई ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता था. उनके लिए सबसे ज्यादा जरूरी था लड़ना, जिसको वो ‘ संघर्ष’ का नाम कहते थे. जाने माने पत्रकार जनार्दन ठाकुर अपनी किताब ‘ ऑल द जनता मेन ‘ में लिखते हैं, ” राज नारायण के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दिन आया था सितंबर 1958 में जब उन्होंने अपने समाजवादी साथियों के साथ यूपी विधानसभा में ऐसा हंगामा मचाया था कि उनको सदन से निकलवाने के लिए पहली बार हेलमेट लगाए पुलिस कर्मियों को सदन के अंदर बुलाना पड़ा था. ” राजनारायण ने अपने 110 किलो वजन को जमीन पर डाल दिया था और पुलिस वालों को बा कायदा उन्हें खींच कर जमीन पर घसीटते हुए सदन से बाहर ले जाना पड़ा था. जब वो विधानसभा के मुख्य द्वार तक खींच कर ले गए, जब तक उनके सारे कपड़े फट चुके थे और उनके जिस्म पर सिर्फ एक लंगोट बचा था. वहां मौजूद प्रत्यक्ष दर्शियों में से एक ने बताया कि राज नारायण ऐसे लग रहे थे जैसे किसी हैवी वेट पहलवान को अखाड़े में चित कर दिया गया हो.”

भयविहीन शख्सियत
लेकिन एक जमाने में उनके बहुत नजदीकी रहे और इस समय बीएसपी के नेता सुधींद्र भदौरिया उनका एक दूसरा ही रूप खींचते हैं. भदोरिया बताते हैं, ” राजनीति और सामाजिक जीवन में भय नाम का शब्द राज नारायण के शब्दकोश में नहीं था. वो भयविहीन व्यक्ति थे. एक चीज उनमें और थी. जिस चीज को करने वो ठान लेते थे, उसके पीछे तब तक पड़े रहते थे, जब तक वो पूरी नहीं हो जाती थी. ” ” एक वाक्य में मैं इसमें और सम अप कर दूं. उनकी जीवन वाक्य था.’ कबिरा खड़ा बाजार में लिए लकूटी हाथ, जो घर फूके आपना , जो चले हमारे साथ. “
हैवी वेट पहलवान जैसा रूप
अपने चरम रूप में राज नारायण का वजन करीब 110 किलो हुआ करता था. बाद में वो अपने सिर पर हरे रंग का’ बंदना ‘ या स्कार्फ बांधने लगे थे. जाने माने समाजशास्त्री और एक जमाने में राज नारायण क़े बेहद करीबी रहे प्रो. आनंद कुमार कहते हैं, ” एक तो उनके शरीर का आकार अति स्वस्थ हुआ करता था. वो मझौले कद क़े थे और गेहुआ रंग था उनका. बचपन में वो अखाड़े की बहुत शौकीन थे. अगर उनसे किसी का परिचय न कराया जाए तो देखने में वो एक जबरदस्त हैवी वेट पहलवान जैसे लगते थे. ” उनका एक बाल सुलभ संवाद का तरीका हुआ करता था. आपसे मिलते ही वो आपका हाल-चाल पूछेंगे. फिर खाना पीना और कहां ठहरे हैं? ऐसा लगता था जैसे वो आपको पता नहीं कब से जानते हैं. उनसे मिलकर ऐसा लगता था जैसे उनके अंदर एक आग जल रही हो, जो आपके अंदर की ठंडक को दूर कर रही हो, एक तपिश दे रही हो और आपको यकीन दिला रही हो. “
लोहिया से मनमुटाव और फिर मांगी माफी
राजनारायण की राजनीतिक गुरु थे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया. उनके अनुयायियों की बात मानी जाए तो जो रिश्ता राम और हनुमान का था, वो ही लोहिया और राज नारायण के बीच का था. लेकिन एक बार राम मनोहर लोहिया भी राज नारायण से नाराज हो गए थे. आनंद कुमार बताते हैं, ” कहते हैं कि जब राज नारायण राज्यसभा में आए तो उसे समय लोहिया की राय थी कि जो लोग लोकसभा चुनाव हार गए हों, उन्हें राज्यसभा या विधान परिषद में नहीं आना चाहिए. उसको वो पिछला दरवाजा मानते थे. वो खुद 1957 और 1962 का चुनाव हारे थे, लेकिन उन्होंने राज्यसभा के जरिए संसद पहुंचने से इनकार कर दिया था. ” राजनारायण गुरु का आदेश का पालन करने के लिए गुरु से आगे भी निकल जाते थे. वो जानते थे कि अगर वो संसद से गैर हाजिर हो जाएंगे तो हालत बिगड़ जाएंगे. उत्तर प्रदेश की राजनीति में और वो बाद में भी साबित हुआ. लेकिन डॉ. लोहिया कथनी और करनी की एकता को मानने वाले थे, इसलिए वो राज नारायण की इस हरकत से नाराज हो गए थे. “
” कहते हैं कि राजनारायण रोज उनके 7 गुरुद्वारा रकाबगंज के घर के सामने आकर बैठ जाते थे. अंदर खबर जाती थी कि राज नारायण बैठे हुए हैं और डॉ लोहिया नाराज होकर कहते थे,’ बैठे रहने दो उसको.’ कहते हैं एक दिन राजनारायण रोते हुए घर के अंदर प्रवेश कर गए और उससे सारी गांठ खुल गई और सारे मैल धुल गए. उन्होंने क्षमा भाव से लोहिया से कहा, कि ये मेरा पहला और आखिरी दोष होगा. आगे से मैं कोई ऐसी चीज नहीं करूंगा जिससे आपको तकलीफ पहुंचे. “

इंदिरा गांधी से चुनावी टक्कर
1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली चुनाव क्षेत्र से इंदिरा गांधी ने उन्हें एक लाख से भी अधिक मतों से हराया. लेकिन राजनारायण ने इसे अदालत में चुनौती दी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और उन पर 6 सालों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया. मशहूर लेखिका कैथरीन फ्रैंक ने इंदिरा की जीवनी’ द लाइफ ऑफ़ इंदिरा गांधी’ मे लिखा, ” राज नारायण को भारत के मसखरों का राजकुमार कहा जाता था. उनके रंगीन शख्सियत थी. वो अपने सिर पर एक बंदना बांधते थे और उनका पूरा हाव भाव एक विदूषक की तरह होता था. जब उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की तो उसे एक स्टंट माना गया. उसमें बहुत गहराई नहीं थी. ” ” उन्होंने इंदिरा गांधी पर आरोप लगाया कि इंदिरा ने यशपाल कपूर को अपना चुनावी एजेंट बनाया जबकि वो शासकीय सेवा में थे. उनका इंदिरा पर दूसरा आरोप था कि उन्होंने प्रचार के दौरान चुनावी मंच और लाउडस्पीकर लगाने के लिए सरकार के पीडब्लूडी कर्मचारियों का इस्तेमाल किया. ” ” 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने राजनारायण को एक लाख से भी ज्यादा वोटो से हराया था.
इंदिरा से दोबारा चुनाव लड़ने का फैसला
बहरहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले का नतीजा यह रहा कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को जिसमें राजनारायण भी शामिल थे, गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जब 1977 के चुनाव की घोषणा के बाद, 19 महीनों बाद राज नारायण की रिहाई हुई और किसी भी नेताओं ने इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने का हिम्मत नहीं जुटा पाई, तब राज नारायण ने तय किया कि वो इंदिरा गांधी के खिलाफ फिर चुनाव लड़ेंगे.
किसी को यकीन नहीं था कि राजनारायण चुनाव जीतेंगे
1977 के चुनाव में आपातकाल की ज्यादतियों और जबरन नसबंदी के कारण फिजा इंदिरा गांधी के खिलाफ बन गई थी, लेकिन कोई यह कल्पना नहीं कर रहा था कि इंदिरा गांधी खुद अपना चुनाव हार जाएगी और इस तरह राजनारायण चुनाव जीत कर लोक बंधु कहलाए. ऐसी शख्सियत मिजाज राजनेता थे लोक बंधु राज नारायण.