जेपी ने हिलाई थी 1974 में नींव, 90 से संभल नहीं पाई,2025 में कांग्रेस का नया दांव…

2025 में बिहार में खोई जमीन हासिल करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दिया है. राहुल गांधी बार-बार बिहार आ रहे हैं. पार्टी की नजर मुख्य रूप से दलित, अति पिछड़ा, महिला और युवाओं पर है.

नई दिल्ली/ पटना/ हैदराबाद, 20 जुलाई, 2025. एक दौर था जब बिहार में कांग्रेस का एकछत्र राज था. आजादी के बाद, 1967 से पहले हुए चुनाव तक उसे किसी दल की ओर से चुनौती नहीं मिली. बाद के दिनों में आपातकाल और जेपी आंदोलन से छात्रों— युवाओं का आक्रोश उसपर भारी पड़ा. पार्टी नेतृत्व बिहार में प्रयोग के तौर पर मुख्यमंत्री बदलते रहा, और कांग्रेस में गुटों की दरार चौड़ी होती गई. रही सही कसर 1990 के दशक में मंडल– कमंडल के दौर में भाजपा और क्षेत्रीय दलों ने पूरी कर दी. अब 2025 में बिहार में खोई हुई जमीन की वापसी के लिए कांग्रेस पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है. दलित और पिछडों की वकालत करते हुए राहुल गांधी भी चुनावी साल में कई बार बिहार आ चुके हैं. बिहार में सोशल इंजीनियरिंग, जातीय राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उभार ने कांग्रेस की बची — खुची जमीन छीन ली. पार्टी अर्श से फर्श पर आ गिरी. तब से आज तक वह सत्ता से दूर हुई. तब वह 318 सीट पर चुनाव लड़कर 128 सीट ही जीत पाई थी. 1972 में पार्टी 167 सीट जीतकर पुनः सत्ता में लौटी. लेकिन, 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन ने कांग्रेस की नींव हिला दी.
छात्र आंदोलन से बिहार में नए राजनीतिक क्षत्रपों का उदय हुआ. आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस के 286 में से सिर्फ 57 उम्मीदवार ही सफल हो पाए.

भागलपुर में हुए दंगों से मुसलमानों ने भी दामन छोड़ा
हालांकि, जनता पार्टी सरकार की आपसी खींचातान ने 3 साल बाद 1980 में ही विधानसभा चुनाव का मार्ग प्रशस्त कर दिया. इस चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत मिला. पार्टी ने 311 सीटों पर चुनाव लड़कर 169 पर कब्जा किया . इंदिरा गांधी की मृत्यु से उपजी सहानुभूति लहर 1985 के चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में रही. जनता ने 196 सीटें देकर उसे फिर से सत्ता पर बैठाया. 1980 से 90 के बीच का काल कांग्रेस के स्वर्णकाल रहा. हालांकि, इस दौरान कांग्रेस अलाकमान ने बिहार में 6 मुख्यमंत्री बनाए. ऐसे में सभी अपनी कुर्सी बचाने में ही लग रहे. पार्टी के अंदर गुटबाजी बढ़ती गई . इसका परिणाम पार्टी को भुगतना पड़ा . 1989 में भागलपुर में हुए दंगों से मुसलमानों ने भी कांग्रेस का दामन छोड़ दिया. पार्टी से पिछड़ा और दलित वोट बैंक पहले ही खिसक चुका था. अगड़ों को भाजपा ने अपने पक्ष में कर लिया था. फलस्वरूप 1990 आते-आते पार्टी के पास कोई ठोस जनाधार नहीं बचा.
कांग्रेस का आधार वोट बैंक खिसककर क्षेत्रीय दलों के पास चला गया. इसी बीच मंडल की राजनीति हावी हो गई. नतीजन 1990 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई , जबकि उसने 323 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. जनता दल के नेतृत्व में लालू यादव की सरकार बनी. पिछड़ों की गोलबंदी के चलते इसके बाद हुए 7 चुनावों में कांग्रेस पार्टी सीटों के लिए तरसती रही . 1995 में उसके 320 में से 29 और 2000 में 324 में से 23 प्रत्याशी ही सफल हुए. अविभाजित बिहार का यह अंतिम चुनाव था. 1990 के बाद बिहार में कांग्रेस गठबंधन के सहारे भले ही राज्य की सत्ता में भागीदारी भी बनी, लेकिन खुद की स्थिति कमजोर होती गई.

2015 से गठबंधन के तहत लड़ रही चुनाव

फरवरी 2005 में लोजपा के साथ मिलकर उसने चुनाव लड़ा. 84 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिसमें 10 जीत पाए. अक्टूबर 2005 में फिर राजद के साथ गठबंधन में अपने खाते की 51 सीटों में से 9 पर कब्जा जमाया. 2010 में पार्टी ने 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन सिर्फ 4 ही सफल हो सके. 2015 में उसने गठबंधन के तहत अपने हिस्से के 41 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. इस चुनाव में जदयू — आरजेडी के साथ का उसे फायदा मिला. पार्टी का स्ट्राइक रेट सुधरा. पार्टी ने 41 में से 27 सीटों पर जीत हासिल की. 2020 में भी कांग्रेस ने महागठबंधन में चुनाव लड़ी. 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिसमें 19 सफल हुए .

2025 में दलित, पिछड़े, महिलाओं पर नजर
पार्टी 2025 चुनाव से पहले अति पिछड़ों, दलितों, महिलाओं और युवाओं के लिए लोक लुभावन वादे कर रही है. संगठन में बदलाव कर उसने गोलबंदी के प्रयास शुरू किए हैं. पहली बार दलित को प्रदेश अध्यक्ष की कमान दी गई है. राहुल गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के ताबड़तोड़ दौरे हो रहे हैं. प्रभारी कृष्ण अल्लावारू अपनी टीम के साथ रात दिन मेहनत कर रहे हैं. पार्टी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए पुरजोर प्रयास करती दिख रही है, पर देखना होगा कि वह इसमें कितना सफल होती है.