9 अगस्त 1942 अगस्त क्रांति में आजादी के आंदोलन के स्वर्णिम अध्याय:- डॉ सुनीलम

हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट

हैदराबाद, 9 अगस्त 2025. 9 अगस्त 1942 का दिन 1857 की क्रांति के बाद आजादी के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण जन क्रांति दिवस है. 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासमिति द्वारा मुंबई में ‘ करो या मरो, भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया गया था. 8 अगस्त की रात को कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे . 9 अगस्त को प्रतिबंध के बावजूद मुंबई में हजारों राष्ट्रभक्तों ने राष्ट्रध्वज फहराने का प्रयास किया जिसमें लाठी, गोली चली. इसके बावजूद अरुणा आसफ अली ने तिरंगा फहराया . अगस्त क्रांति आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने लाठी, गोली, गिरफ्तारी, जेल, सजा सब कुछ का सहारा लिया. जवाहरलाल नेहरू ने ‘ दि डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ‘ में लिखा है कि सरकार करती है कि पुलिस या फौजी की गोली से 1020 लोगों की जान गई तथा 3200 जख्मी हुए. लेकिन जनता का अंदाजा है कि करीब 50 हजार लोग मारे गए. शायद 44000 की तादाद कुछ सही है. क्योंकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 538 स्थानों पर गोलियां चलाई गई. डॉ राम मनोहर लोहिया के मुताबिक, शहीद होने वालों, घायलों तथा फर्जी मुकदमे झेलने वालों की संख्या 50000 से अधिक थी. अगस्त क्रांति आंदोलन 1857 के बाद स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जन आंदोलन है.
1857 के आंदोलन का नेतृत्व रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, अजीमुल्लाह और नाना साहेब जैसे दिगज्जों ने मिलकर किया था. इसी विद्रोह के बाद कांग्रेस का गठन ए. ओ ह्युम, दादा भाई नौरोजी, बदरुद्दीन तैयब जी, फिरोजशाह मेहता के सहयोग से किया था. अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल और महाराष्ट्र में जबरदस्त आंदोलन चले जिसका नेतृत्व अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे क्रांतिकारी कर रहे थे. लॉर्ड कर्जन के द्वारा बंगाल का विभाजन किए जाने के बाद आंदोलन तेज हो गया. तिलक जी ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर होम रूल लीग बनाई. 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच लखनऊ पेक्ट हुआ. अंग्रेजों ने जब भारतीयों के
मूल अधिकारों को चुनौती दी तब गांधी जी ने सत्याग्रह शुरू किया. यह वही दौर है जब जलियांवाला बाग में क्रूरतम तरीके से जनरल डॉयर द्वारा नरसंहार किया गया. तिलक जी की मौत ने पूरे देश को झंकझोर दिया. भारत छोड़ो आंदोलन के पहले गांधी जी ने 1919, 1921, 1930, 1932 में बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाए. 28 दिसंबर 1931 से 1934 तक शपथ आंदोलन चले. इस बीच कांग्रेस नया संविधान बनाने की प्रक्रिया में लग गई. गांधी जी के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने चुनाव लड़ा तथा सात राज्यों में सरकार बनाई. 1939 में बिना सलाह मशविरा के अंग्रेजों ने भारत के युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी. कांग्रेस ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. जापान ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया. सिंगापुर, मलेशिया और रंगून पर कब्जा कर लिया. काकीनाडा और विशाखापट्टनम पर हवाई हमले होने लगे तब अमेरिका के रूजवेल्ट तथा चीन के चांग काई शेक नाम ब्रिटिश सरकार पर कांग्रेस के साथ समझौता करने के लिए दबाव डाला, अंग्रेजों ने स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा. सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने वजह से इसका विरोध किया. गांधी जी ने इसे पोस्ट डेटेड चैक ऑफ क्रेसिंग बैंक बताया. डॉ लोहिया के मुताबिक, क्रिप्स का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद की योजना को, जिसका उद्देश्य साम्राज्यवाद के क्रियान्वयन हेतु मार्ग प्रशस्त करने के लिए भारत का अनेक टुकड़ों में बंटवारा करना, रजवाड़ों को स्वतंत्र करना, प्रति को भारत से विलग होने का अधिकार दिया जाना, सांप्रदायिक एवं व्यक्तिगत विद्वेष के आधार पर भारतीय जन समुदाय की लगातार बढ़ती जा रही है एकता को खंडित करना था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापान भारत के सीमाओं तक पहुंच गया था, तब डॉक्टर लोहिया ने’ कपटी जापान और आत्म संतुष्ट भी ब्रिटेन’ नामक लेख लिखा था, जिसे गांधी जी ने अपनी संपादकीय टिप्पणी के साथ हरिजन में प्रकाशित किया था. उन्होंने लिखा था कि मेरी नजर में तोजो उतना ही दुष्ट है जितना कि हिटलर या चर्चिल. क्योंकि यदि इस दर्दनाक नरसंहार का अंत इनमें से किसी की विजय के रूप में होता है तो उससे बेहतर विश्व की मेरी आशाएं चकनाचूर हो जाएगी. गांधीजी भी मानते थे कि दोनों खतरनाक हैं. भारत सिर्फ पूर्ण स्वतंत्र होकर ही फासीवाद के विरुद्ध लड़ी जाने वाली लड़ाई में सही और प्रभावशाली योगदान दे सकता है.’ करो या मरो’ आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर अंग्रेजों द्वारा किए गए दमन का सरकारी कारण, बड़ी संख्या में आम नागरिकों का थानों, सचिवालयों, सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर तिरंगा फहराने का प्रयास था. जिसे अंग्रेज हर कीमत पर विफल करना चाहते थे. अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि कांग्रेस ने 7–8 अगस्त 1942 को जो प्रस्ताव पारित किया है उसके बाद भारत में हुकूमत करने की उसकी गुंजाइश बहुत कम रह गई है. प्रस्ताव में कहा गया था कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पूरे आग्रह के साथ भारत से ब्रिटिश सत्ता को हटा लेने की मांग को दोहराती है. भारत की स्वतंत्रता की घोषणा हो जाने पर एक अस्थाई सरकार स्थापित कर दी जाएगी और स्वतंत्र भारत मित्र राष्ट्रों का मित्र बन जाएगा एवं स्वतंत्रता संग्राम के सम्मिलित प्रयत्न की परीक्षाओं और दुख सुख में हाथ बटाएगा. अस्थाई सरकार देश के मुख्य दलों और वर्गों के सहयोग से ही बनाई जा सकती है. इस प्रकार यह एक मिलीजुली सरकार होगी, जिसमें भारतीयों के समस्त महत्वपूर्ण वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा . उसका प्रथम कर्तव्य अपनी समस्त सशस्त्र और अहिंसात्मक शक्तियों द्वारा मित्र राष्ट्रों से मिलकर भारत की रक्षा करना, आक्रमण का विरोध करना और खेतों, कारखानों एवं अन्य स्थानों में काम करने वाले उन श्रमजीवियों का कल्याण और उन्नति करना होगा जो निश्चय ही समस्त शक्ति और अधिकार के वास्तविक पात्र हैं . उक्त प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया और सरदार पटेल ने उसका समर्थन किया. प्रस्ताव पारित होने के बाद गांधी जी ने भाषण देते हुए कहा कि हमने जो काम का बीड़ा उठाया है उसे पूरी लगन के साथ पूरा करें, ताकि न केवल इस देश में, अपितु समस्त विश्व में शाश्वत शांति और न्याय की स्थापना हो सके. उन्होंने हर एक हिंदुस्तानी से कहा कि वह अपने आप को आजाद समझे . उन्होंने कहा कि मैं इस लड़ाई में आपका नेतृत्व करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता हूं. सेनापति अथवा नियंत्रक के रूप में नहीं बल्कि आपके तुच्छ सेवक के रूप में और जो कोई सर्वाधिक सेवा करेगा वहीं मुख्य सेवक माना जाएगा. मैं तो राष्ट्र का मुख्य सेवक हूं. अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधी जी ने कहा,’ मैंने कांग्रेस को बाजी पर लगा दिया है ‘ वह करेगी या मरेगी.’ उन्होंने कहा था कि मैं आपको एक संक्षिप्त मंत्र देता हूं . इसे आप हृदयस्थ कर सकते हैं तथा अपनी हर एक सांस में इसे प्रकट होने दे सकते हैं यह मंत्र है –‘ करो या मरो’. हम या तो भारत को आजाद करेंगे या ऐसा कहते हुए मर जाएंगे, हम अपनी दासता को भुगतने के लिए जिंदा नहीं रहेंगे. प्रत्येक पुरुष या स्त्री कांग्रेसी इसी अटल निश्चय के साथ संघर्ष में शामिल होंगे. हम अपनी दासता को दीर्घायु होते देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे . डॉ लोहिया शीर्षस्थ कांग्रेसी नेताओं के गिरफ्तार हो जाने के बाद भूमिगत हो गए उन्होंने देशभर में गतिविधियों का संयोजन करने के लिए केंद्रीय निदेशालय बनाया. अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली जैसे नेता उनके साथ थे. उन्होंने मुंबई में 13 अगस्त 1942 से 14 अगस्त 1942 तक भूमिगत कांग्रेस रेडियो स्टेशन का संचालन किया . बाद में कोलकाता में कांग्रेस रेडियो स्टेशन की स्थापना की गई. उन्होंने डू एण्ड डाई ‘ नाम से भूमिगत बुलेटिन भी जारी किया. फाइटर्स एवं मार्च फॉरवर्ड जैसे पंपलेट भी निकाले. उस समय जेपी जेल में थे. सर्वविदित है कि गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल से भाग निकलने में सफल रहे. लोहिया को अंतत : 20 मई 1944 को मुंबई में पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. ब्रिटिश लेबर पार्टी के प्रमुख प्रो. हेराल्ड लास्की को लिखे गए पत्र में लिखा था कि 4 महीने से अधिक किसी न किसी रूप में मेरे साथ दुर्व्यवहार किया जाता रहा है. मुझे दिन – दिन भर और रात — रात भर जगाए रखा जाता है. सर्वाधिक लगातार 10 दिन तक ऐसा किया गया. जब मैंने इसका प्रतिरोध किया तो मुझे हथकड़ी लगे हाथों को चारों ओर से घेर कर जमीन पर गिरा दिया गया. अक्टूबर 1945 में उनके पिता हीरालाल लोहिया की मृत्यु हो गई. ( हीरालाल जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे तथा गांधी जी के नजदीकी कार्यकर्ता थे) लेकिन कृपा प्रकार पेरोल लेने से अपने पिता के इकलौता संतान होने के बावजूद उन्होंने जेल से रिहा होने से इनकार कर दिया. जेल से छूटने के बाद जानकारी मिलने पर जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें पत्र लिखा,’ क्या तुम अभी अपने पुराने रूप में हो, तीक्ष्ण बुद्धिमान, थोड़ा चंचल और स्वेच्छाचारी? क्या जीवन ने तुम्हें कठोर बना दिया है? किंतु ये केवल प्रश्न है, जिनका तुम उत्तर नहीं दे सकते और मुझे उत्तर खोज कर निकालने के लिए तुमसे मिलना होगा. मैं आशा करता हूं कि जब भी हम मिलेंगे, तुम मेरी और नहीं देखोगे. जैसा कि तुम करते हो, एक खोल के माध्यम से मुझे देख रहे होगे. उल्लेखनीय है कि डॉ लोहिया जेल से छूटने के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए गोवा गए, जहां गोवा के निवासियों ने पुर्तगाली सरकार की दमनकारी नीतियों की उन्हें जानकारी दी . तब उन्होंने गोवा मुक्ति आंदोलन की शुरुआत की . जल्द ही गोवा को पुर्तगाली शासको से स्वतंत्र कराने में सफलता हासिल की. अगस्त क्रांति में महिलाओं की अहम भूमिका रही . विशेष कर अरुणा आसफ अली को अगस्त क्रांति की नायिका माना जाता है. 9 अगस्त को उन्होंने सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराने के आंदोलन का सफल श्री गणेश किया था. भूमिगत होकर उन्होंने आंदोलन चलाया. उस समय अंग्रेजों ने 5 हजार रुपए का इनाम घोषित किया. गांधी जी ने कहा कि अपने आप को इस तरह भूमिगत रहकर मारने की बजाए साहस से आत्मसमर्पण कर दो तथा 5 हजार रुपए का इनाम खुद लेकर हरिजन के फंड में जमा कर दो. लेकिन वे भूमिगत रही. दिल्ली में 26 सितंबर 1942 को उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई. 26 जनवरी 1946 को जब अंग्रेजों ने सभी नेताओं को छोड़ दिया और अरुणा आसफ अली के गिरफ्तारी वारंट वापस ले लिए तब भूमिगत मोर्चाबंदी के लिए उन्हें अखबारों ने 1942 की झांसी की रानी लिखकर संबोधित किया. अरुणा आसफ अली 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान 1 साल जेल में रहकर 1932 में भी उन्हें 6 महीने की सजा मिली थी. व्यक्ति सत्याग्रह के दौरान भी वे जेल में रही थी. इसी तरह सुचेता कृपलानी ने 1942- 43 में भूमिगत रहकर आंदोलन चलाया एवं भूमिगत स्वयंसेवक दल की स्थापना भी की. 1944 में उन्हें गिरफ्तार किया गया. 1945 में वे रिहा की गई. इसी तरह उषा मेहता ने अगस्त क्रांति के दौरान 9 अगस्त से ही सक्रिय भागीदारी की. 14 अगस्त को 1942 को ही उन्होंने रेडियो प्रसारण शुरू कर दिया. 12 नवंबर को उन्हें बाबू भाई प्रसाद के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. 6 महीने तक उन्हें यातनाएं दी गई. रेडियो षड्यंत्र केस में उन्हें 7 साल की सजा हुई. अप्रैल 1946 में वे रिहा हुई. वनलता सेन 1942 के आंदोलन
के दौरान एक कार्यक्रम में लाठी चार्ज में घायल हुई, उन्हें गिरफ्तार किया गया, लगातार यातनाएं दी गई. 1945 में वे रिहा हुई. 1930 से ही वे अनुशीलन दल की सदस्या बनकर विप्लवी कार्यों में भाग लेती थी. अखिल बंगाल छात्र समिति की मंत्री होने के नाते उनका नाम टीटागढ़ षड्यंत्र केस में भी जोड़ा गया था. अनुशीसल दल से जुड़ा एक और नाम किरण चक्रवर्ती का है जिन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की. 1942 में ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. दिनाजपुर और ढाका प्रेसीडेंसी जिलों में रही. 1945 में रिहा हुई. 1942 के आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 1942 को सिविल कोर्ट में माया घोष ने झंडा फहराने का प्रयास किया. पुलिस ने गोली चलाई इसके बावजूद उन्होंने झंडा नहीं छोड़ा. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 2 साल जेल में रहने के बाद 1944 में उनकी रिहाई हुई. अगस्त क्रांति आंदोलन में जयप्रकाश नारायण की भूमिका अग्रणी थी . हजारीबाग जेल से भगाने के बाद उन्हें पकड़ा गया. सभी कांग्रेस जनों को छोड़ने के बावजूद जब जयप्रकाश नारायण और डॉ लोहिया को नहीं छोड़ा गया तब 2 अप्रैल 1946 को गांधी जी ने लॉर्ड एथिक लॉरेंस को पत्र लिखकर कहा कि जयप्रकाश नारायण और डॉ लोहिया जैसे लोगों को जेल में रखना हास्यास्पद है. दोनों विद्वान और सु संस्कृति व्यक्ति हैं जिन पर किसी भी समाज को गर्व हो सकता है. 13 अप्रैल 1946 को प्रार्थना सभा में भाषण देते हुए गांधी जी ने कहा कि आप लोग जयप्रकाश नारायण और डॉक्टर लोहिया को जानते हैं ये दोनों व्यक्ति साहसी, कर्मठ और विद्वान है वे आसानी से धनी बन सकते थे. किंतु उन्होंने सेवा और त्याग का रास्ता चुना. उनकी प्रबल इच्छा थी, देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ना. यह स्वाभाविक ही था कि विदेशी सरकार ने उन्हें खतरनाक मानकर जेल भेजा. हमारे पास योग्यता को मापने का अलग पैमाना है और हम उन्हें देशभक्त मानते हैं, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि के प्यार में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया . अहिंसा के पैमाने से उनमें कोई कमी रही हो, यह इस समय बिल्कुल और प्रासंगिक है. 1942 में देश के विभिन्न इलाकों में समानांतर सरकारें गठित की गई थी. बलिया और सतारा जैसे 12 स्थानों की कहानियां स्कूलों में भी पढ़ाई जाती है. ब्रिटिश सेना ने बड़े पैमाने पर हथियारों का इस्तेमाल किया. नरसंहार किए, गोलियां चलाई, हजारों देशभकतों पर मुकदमे लड़कर उन्हें जेल पहुंचा दिया गया. सजाएं दी गई. क्रांतिकारियों के पास ना तो मजबूत संगठन था और न ही अंग्रेजों का मुकाबला करने वाले हथियार. कांग्रेस के नेता पहले ही जेल में थे, जो बाहर थे वह हिंसा तथा गुप्त कार्यवाही पर गांधी जी की नीतिगत रोक के चलते उस तरह सक्रिय नहीं हुए जैसा हो सकते थे. हालांकि देशभर में बड़े पैमाने पर सामूहिक प्रतिरोध भी हुए. मुख्य तौर पर समाजवादियों , क्रांतिकारी गांधीवादियों तथा सुभाषवादियों ने मिलकर यहां आंदोलन चलाया. लेकिन आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व शिथिल हो जाने के कारण 1942 का आंदोलन सतत रूप से इस तीव्रता से नहीं चल सका जैसे की शुरुआत हुई थी . अगस्त क्रांति के चलते देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ जो भावना पैदा हुई और जो वातावरण बना तथा बाद में आईएनए के विद्रोह तथा सेना के भीतर विद्रोह की परिस्थिति बनने के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पैदा हुई स्थिति और ब्रिटेन से आए राजनीतिक बदलावों के चलते अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि, डोमिनियन स्टेटस के प्रस्ताव को देश के सभी राजनीतिक दलों ने विभिन्न कारणों से ठुकरा दिया था लेकिन अंग्रेज देश का विभाजन करने में कामयाब रहे. 1942 के आंदोलन में जनता के बीच बनी एकजुटता यदि कायम रहती तो देश का विभाजन संभव नहीं था. लेकिन देश की कई पार्टियां और नेता अंग्रेजों के हथियार बने और उन्होंने गांधी जी तथा समाजवादियों के विभाजन का विरोध करने के बावजूद देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया. विभाजन के दौरान 50 लाख भारतीय या तो मारे गए या विस्थापित हुए. 1942 का आंदोलन यदि संगठित होता तो इस त्रासदी से बचा जा सकता था. डॉ राम मनोहर लोहिया ने अगस्त क्रांति को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है. यह डॉ. जीजी पारिख 2 अगस्त 1967 को लिखे गए पत्र से स्पष्ट होता है, जिसमें उन्होंने लिखा है,’ भारत छोड़ो लोगों को आप इकट्ठा कर रहे हो यह बहुत अच्छा काम है, इस बार मैं इतना सौभाग्यशाली नहीं हूं कि मुंबई आपके उत्सव में आ सकूं . जरा धूमधाम से उत्सव मनाइए. ये हो सके तो कुछ आगे भी बढ़िए. 15 अगस्त राज्य दिवस है, 9 अगस्त जन दिवस है. कोई एक ऐसा दिन जरूर आएगा जब 9 अगस्त के सामने 15 अगस्त फीका पड़ेगा और हिंदुस्तानी अमेरिका और फ्रांस के 4 और 14 जुलाई, जो जन दिवस है, की तरह 9 अगस्त को मनाएंगे. यह भी हो सकता है कि हिंदुस्तानी कभी अपना बंटवारा खत्म करें और उसी के साथ या उससे पहले 15 अगस्त को भूल जाने की कोशिश करें. समाजवादियों को डॉ राम मनोहर लोहिया का यह सपना पूरा करने का प्रयास करना चाहिए. बंटवारा खत्म करना तुरंत संभव नजर नहीं आता लेकिन भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधार कर वीजा पासपोर्ट खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है. यदि 28 देश मिलकर यूरोपीय संघ बना सकते हैं तो दक्षिण एशिया का महासंघ क्यों नहीं बन सकता? समाजवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता संगठन और पार्टियां समाजवादी नेताओं के जन्मदिवस और निर्माण दिवस को मानती ही हैं, अब यह जरूरी हो गया है कि समाजवादी अगस्त क्रांति– जन क्रांति दिवस, भारत छोड़ो दिवस, करो या मरो दिवस मनाने का मन बनाएं तथा 9 अगस्त के क्रांतिकारियों की नीतियों, सिद्धांतों और कार्यक्रमों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए एकजुट हों. ( डॉ सुनीलम, समाजवादी कार्यकर्ता)