एक तेजतर्रार युवा नेता, जो सबको साथ लेकर चलता है. राज्य में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस नेता अनुमुला रेवंत रेड्डी को हैदराबाद में तब के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. यह पहली बार नहीं था कि उन्हें तेलंगाना पुलिस ने गिरफ्तार किया हो. हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो चीफ देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट.
हैदराबाद, 1 जनवरी, 2024. भावुक रेवंत रेड्डी ने एक बार कहा था, वे यह कभी नहीं भूलेंगे कि जब उनकी बेटी की शादी हो रही थी तो वे जेल में बंद थे. रेड्डी तब तेलंगाना तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) के राज्य अध्यक्ष थे. उन्हें अगले दिन अपनी बेटी की सगाई करनी थी कि आधी रात को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ( एसीबी) के पुलिस वाले मुख्य दरवाजा तोड़कर घर में घुसे और सोते हुए में घसीटते हुए ले गए. 3 दिसंबर 2023 को जब शुरुआती रुझानों में कांग्रेस की जीत की संभावना दिखने लगी तो पुलिस महानिदेशक अंजनी कुमार और अन्य पुलिस अधिकारियों ने रेवंत को गुलदस्ता देकर बधाई दी तथा हाथ मिलाया. हालांकि, कई लोगों ने इसे मीठा बदला बताया. आंध्र प्रदेश से 2014 में टूटकर बने तेलंगाना में कांग्रेस की पहली बार 119 सदस्यीय विधानसभा में 64 सीटों के साथ वापसी हुई और बीआरएस 87 बेदखल हुई. कांग्रेस आलाकमान ने राज्य के कई दिग्गजों को दरकिनार करते हुए प्रदेश अध्यक्ष 54 वर्षीय रेवंत रेड्डी पर ही भरोसा जताया. वे 7 दिसंबर 2023 को राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने. दरअसल, कई जानकार बताते हैं कि यह चुनावी मुकाबला बीआरएस और कांग्रेस से ज्यादा केसीआर व रेवंत रेड्डी के बीच था. केसीआर पिछले 40 वर्षों में कभी चुनाव नहीं हारे, चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का . तेलंगाना में 2018 में उन्हें और उनकी पार्टी को भारी जीत मिली थी और कांग्रेस इकाई अंक तक सिमट गई थी. नगर कुरनूल ( पहले महबूबनगर ) जिले के कोंडाररेड्डी पल्ली में 8 नवंबर 1969 को जन्मे रेवंत हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय के आंध्र विद्यालय कॉलेज से बीए तक पढ़े हैं. उनकी दो दशक की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत बीजेपी की छात्र शाखा एबीवीपी के साथ हुई थी. लेकिन 2007 में रेवंत निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एमएलसी चुनाव जीत गए. युवा रेवंत के जोश – खरोश को देखकर तब के ताकतवर मुख्यमंत्री दिवंगत डॉ वाईएस डॉक्टर राजशेखर रेड्डी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रेवंत के सामने कांग्रेस में शामिल होने की पेशकश रखी. लेकिन 2007 में रेवंत ने विपक्षी तेलुगु देशम पार्टी को चुना और 2009 में अविभाजित आंध्र प्रदेश में टीडीपी टिकट पर विधायक चुने गए एवं 2014 में तेलंगाना में विधायक बने. लेकिन तेलंगाना में तेलुगु देशम पार्टी का कोई भविष्य न देखकर रेड्डी 2017 में कांग्रेस में शामिल हो गए और 2018 के चुनाव में अपने गृह जिले से तेलुगु राष्ट्र समिति उम्मीदवार से चुनाव हार गए . पहला स्थानीय निकाय चुनाव जीतने के बाद से यह किसी भी चुनाव में उनकी पहली हार थी . लेकिन 4 महीने बाद ही रेवंत रेड्डी ने मल्काजगीरी लोकसभा सीट टीआरएस उम्मीदवार को मामूली अंतर से पराजित कर दिया और जीत हासिल की. हालांकि, यह आसान नहीं था, क्योंकि मल्काजगीरी देश में मतदाताओं की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ी संसदीय सीट है . उन्हें जुलाई 2021 में तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, तो राज्य कांग्रेस के कई नेताओं ने उनकी संघ पृष्ठभूमि को लेकर काफी विरोध जताया लेकिन उन्हें कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का पूरा समर्थन हासिल था. उनके सामने एक चुनौती यह थी कि तब कांग्रेस की सिर्फ तेलंगाना में पांच विधायक थे. इस प्रकार 2023 का विधानसभा चुनाव न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि राज्य में प्रभावशाली रेड्डी समुदाय के लिए भी अस्तित्व की लड़ाई थी, जो एक दशक से सत्ता से दूर था. रेवंत रेड्डी अपनी चुटीली भाषण कला और मुहावरों के पंच से लोगों से बड़ी आसानी से जुड़ जाते हैं. उन्होंने राज्य में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और भारत राष्ट्र समिति नेतृत्व के सत्ता मद और अहंकार से लोगों में सत्ता विरोधी मूड को भाँप लिया, और उसे कहावतों, चुटकुलों व मारपू कावली, कांग्रेस रावली ‘( बदलाव जरूरी, कांग्रेस सरकार चाहिए) जैसे आकर्षक नारों से लोगों को नया संदेश दिया और सड़कों पर उतर आए . सिविल सोसाइटी संगठनों, बेरोजगार युवाओं, किसने और महिलाओं को कांग्रेस के साथ जोड़ा . बीआरएस सरकार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शनों का दौड़ शुरू हो गया . उन्होंने कई चुनावी अभियानों का नेतृत्व किया. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी एवं कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ दर्जनों रैलियां की. कांग्रेस की 6 गारंटियों को दोहराते हुए . बीआरएस सरकार पर नए हमले किए. चुनाव प्रचार होने से पहले भी, रेवंत कई मौकों पर भारत राष्ट्र समिति की प्रमुख के. चंद्रशेखर राव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंडी संजय को सीधे निशाने पर लेते रहे. दूसरी तरफ कांग्रेस की जीत में अनुसूचित जाति के वरिष्ठ नेता मल्लू भट्टी विक्रमार्क पदयात्रा भी बहुत कुछ मायने रखता है. वे अब राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं. तथा वित्त, योजना और ऊर्जा मंत्रालयों को संभाल रहे हैं.