लेफ्ट की ब्रिगेड रैली में जुटती भीड़, क्या मतदान केंद्रोँ तक भी पहुंचेगी ?

पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन के तीनों सहयोगियों यानी तृणमूलकांग्रेस, कांग्रेस और सीपीएम के बीच घमासान जारी है. लेकिन इस सबके बीच बीते दिनों कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वामपंथी युवा संगठन डेमोक्रेटिक फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ( डी वाई एफ आई ) के बैनर तले आयोजित हुई इंसाफ रैली के आयोजक पूरे राज्य से खासी भीड़ जुटाने में कामयाब रहे.

हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो चीफ देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट.

कोलकाता/हैदराबाद,12 जनवरी, 2024.वाममोर्चा के तमाम नेताओं को यह सवाल अभी भी मथ रहा है कि क्या इसका कुछ हिस्सा मतदान केंद्रोँ तक भी पहुंचेगा? इस सवाल की वजह यह है कि साल 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी वाममोर्चा ने कांग्रेस के साथ मिलकर इसी मैदान पर एक विशाल रैली आयोजित की थी जिसके चलते महानगर ठप हो गया था. लेकिन महीने भर बाद हुए चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुल सका था. शायद यही वजह थी कि सीपीएम नेता आभास राय चौधरी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि मैदान में जुटी इस भीड़ को मतदान केंद्रों तक ले आना होगा. लेकिन दूर दराज से आने वाले पार्टी के नेता और कार्यकर्ता रैली खत्म होने के बाद यही सवाल पूछते आए कि लोकसभा चुनाव से पहले इतने कम समय में ऐसा कैसे संभव होगा. दरअसल, डीवाईएफआई ने राज्य के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में 50 दिन लंबी इंसाफ यात्रा की थी . करीब 3 हजार किमी की दूरी तय करने वाली इस यात्रा में कुल मिलाकर 12 लाख लोग शामिल हुए . वाम नेतृत्व को उम्मीद थी कि अगर इसमें से एक तिहाई लोग भी ब्रिगेड परेड मैदान की रैली में पहुंच सके तो अपनी ताकत का प्रदर्शन किया जा सकेगा . रैली में भीड़ को लेकर सबके अलग-अलग दावे जरूर है. लेकिन इस बात पर आम राय है कि रैली में पार्टी ने खासी भीड़ जुटाई थी.

मतदान से दूर रहती भीड़
राज्य में लोकसभा या विधानसभा की एक भी सीट नहीं होने के बावजूद वामपंथी दलों की रैली में इतनी भीड़ जुटने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. पहली बार आदिवासी लोग भी इसमें नजर आए. किसी दौर में चाय बागान इलाकों के आदिवासियों को वाममोर्चा का मजबूत वोट बैंक कहा जाता था . बंगाल सीपीएम के 211 में सत्ता से बाहर होने के बाद ही पार्टी में यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता रहा है कि रैली की अपील पर तो ब्रिगेड परेड मैदान लाल रंग में रंग जाता है लेकिन चुनाव के समय पोलिंग एजेंट तलाशना भी मुश्किल क्यों हो जाता है. इसके लिए मझौले स्तर के नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. इस रैली के बाद भी फिर वही सवाल उठ रहा है कि क्या लोकसभा चुनाव से पहले इस कमी को दूर करना संभव होगा. डीवाईएफआई की प्रदेश सचिव मीनाक्षी मुखर्जी कहती हैं, यह T20 नहीं है. हम टेस्ट मैच खेल रहे हैं. यानी रातों-रात सब कुछ नहीं बदल सकता. राजनीति के मैदान में धैर्य के साथ टिके रहना होगा. सीपीएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम समेत तमाम नेताओं ने अपने भाषण में भाजपा के अलावा राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर जमकर हमले किए और इन दोनों में साठ – गांठ के आरोप लगाए. मोहम्मद सलीम का कहना था, वर्ष 2014 में केंद्र के भाजपा के सत्ता में आने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार तेजी से बढा है. चौकीदार अगर चोर है तो पकड़ेगा कौन? सीपीएम नेता ने कहा कि बीते साल हुए पंचायत चुनाव में हमने अपनी ताकत दिखाई थी . लेकिन वह तो ट्रेलर था. लोकसभा चुनाव में अंतिम नतीजा सामने आएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पूरा जोर अपने परिवार को बचाने पर है . उन्होंने दावा किया कि हाल में पार्टी के पैरों तले की जमीन काफी मजबूत हुई है और लोकसभा चुनाव के नतीजे से यह बात साबित हो जाएगी.

वाममोर्चा का मत प्रतिशत
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, ब्रिगेड रैली में भीड़ तो ठीक-ठाक जुटी थी. लेकिन जो लोग इसमें शामिल होने आए थे वही अपने इलाकों में लौटकर लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट देंगे तो इस आयोजन से सीपीएम को फायदा क्या हुआ. राजनीतिक जानकार कहते हैं, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट को 6% से ज्यादा वोट मिले थे. बीते विधानसभा चुनाव में यह घटकर 5% से नीचे आ गया . लेकिन बंगाल में लेफ्ट वोटरों की अब भी खासी तादाद है. पार्टी की रैली में भीड़ तो जुटती है. अगर इसका छोटा हिस्सा भी वोट में तब्दील हो जाए तो चुनावी तस्वीर बदल सकती है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी ऐसा करने में कामयाब होगी? यही सवाल सीपीएम के बड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को भी मथ रहा है.