
लोकसभा चुनाव के लिए चुनावी रंगमंच पूरी तरह से सज गया है . सभी की नजर उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई है. सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दृष्टि से अहमियत यूं समझी जा सकती है कि राज्य ने अब तक नरेंद्र मोदी सहित देश को 9 प्रधानमंत्री दिए हैं . 24 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस प्रदेश पर अब सबकी नजर है .

हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो प्रमुख देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट
लखनऊ/हैदराबाद,2 मार्च,2024. देश की राजनीतिक धुरी माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में बिखरे विपक्ष से भाजपा इस बार क्लीन स्वीप की संभावनाएं लेकर चल रही है. उधर, मोदी सरकार की हैट्रिक को रोकने के लिए प्रदेश में कांग्रेस और सपा ने हाथ तो मिलाया है, लेकिन 7 वर्ष पहले विधानसभा चुनाव में फेल हो चुके गठबंधन से लोकसभा चुनाव में भी किसी तरह के चमत्कार की उम्मीद नहीं दिखती. विपक्षी सपा और कांग्रेस गठबंधन से दूर अकेले ही चुनाव मैदान में उतरने वाली बीएसपी एक बार फिर एक दशक पहले की शून्य वाली स्थिति में पहुंचने की राह पर है. सूत्र बताते हैं कि प्रदेश में भाजपा ने पिछले दोनों लोकसभा चुनाव बिल्कुल अलग सियासी हालात में लड़े हैं. वर्ष 2014 में भाजपा के सामने जहां कोई बाद विपक्षी गठबंधन नहीं था वहीं वर्ष 2019 के चुनाव में बीएसपी, सपा और आरएलडी एक साथ थे .
मोदी लहर ने बदला वाराणसी का रंग

एक दशक पहले वाराणसी लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव मैदान में मोदी के उतरने से राज्य में ऐसी लहर चली थी कि भाजपा रिकॉर्ड 71 सीटों पर पहुंच गई थी एवं भाजपा के सहयोगी अपना दल ( एस ) ने भी 2 सीटें जीती थी. सताधारी सपा को जहां सिर्फ 5 सीटें मिली थी वहीं कांग्रेस 2 और बीएसपी शून्य पर सिमट कर रह गई. पिछले चुनाव में सपा -बसपा के मिलने पर भाजपा सहयोगी अपना दल ( एस )संग 9 सीटें घटकर 62 पर रह गई थी जबकि बसपा शून्य से 10 और सपा 5 सीटों पर ही रही. सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा था . अमेठी से राहुल गांधी चुनाव हार गए थे. सिर्फ सोनिया गांधी की रायबरेली सीट बच गई थी.
इस बार कुछ ऐसी है तस्वीर
एक बार फिर राज्य के बदले सियासी माहौल में चुनाव होने जा रहे हैं. मोदी से मुकाबले की तमाम कोशिशों के बावजूद बसपा अब तक विपक्षी गठबंधन इंडिया में शामिल नहीं हुई है. विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस के साथ सपा की जुगलबंदी से अबकी इतिहास बदलने के दावे किए गए, लेकिन चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही आरएलडी के जयंत चौधरी ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से वर्षों पुराना नाता तोड़ लिया. अब सपा और कांग्रेस के गठबंधन से ही चमत्कार की उम्मीद लगाई जा रही है. यहां पर गौर करने की बात है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश और राहुल के हाथ मिलाने पर दावा किया गया था कि ‘ यूपी को यह साथ पसंद है ‘, लेकिन प्रदेश वासियों ने दावे को दरकिनार कर चुनाव में ‘ दो लड़कों की जोड़ी’ को सिरे से नकार दिया था.
कांग्रेस 17 और सपा 63 सीटों पर लड़ेगी चुनाव
अब स्थिति यह है कि दशकों तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस सिर्फ 17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि सपा 63 पर. सपा प्रत्याशियों की सूची में बसपा सांसद भी हैं. आजमगढ़ सीट से अखिलेश लड़ने को तैयार हैं . हालांकि, कांग्रेस के प्रत्याशियों की सूची अभी नहीं आई है. लेकिन सोनिया गांधी के चुनाव न लड़ने से रायबरेली से प्रियंका गांधी और अमेठी से एक बार फिर गांधी परिवार से ही किसी सदस्य को चुनाव लड़ाने की चर्चा है.