
एलेक्टरल बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को फटकार लगाई है . बैंक ने कोर्ट से एलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी साझा करने के लिए 30 जून तक का वक्त मांगा था,जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो प्रमुख देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट.
नई दिल्ली/हैदराबाद,11 मार्च, 2024. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान एलेक्टोरल बॉन्ड्स को असंवैधानिक करार देते हुए एसबीआई को इससे जुड़ी सभी जानकारियां 6 मार्च तक चुनाव आयोग को देने के लिए कहा था, लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया. अब कोर्ट ने फटकार लगाते हुए बैंक से कहा है कि वह 12 मार्च तक यह जानकारी दे कि पिछले 5 सालों में किसने, कितने रुपए के चुनावी बॉन्ड खरीदकर किस पार्टी को दिए हैं ? सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद विपक्षी पार्टियां बीजेपी को घेरने में लग गई है. उनका आरोप है कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जानकारी साझा करने से घबरा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का चुनावी फंडिंग पर क्या असर होगा?+ इस स्कीम के तहत जनवरी 2018 और जनवरी 2024 के बीच 16518 करोड रुपए के एलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए थे और इसमें से ज्यादातर राशि राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग के तौर पर दी गई थी. पिछले कुछ सालों में ए रिपोर्ट्स में यह पता चला कि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को मिला था . इन बॉन्ड्स पर पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठ रहे थे और यह आरोप लग रहा था कि यह योजना मनी लांडिंग या काले धन को सफेद करने के लिए इस्तेमाल हो रही थी. एलेक्टोरल बॉन्ड्स की वैधता पर उठाते हुए एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ( एडीआर ), कॉमन कॉज और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पांच याचिका कर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

फैसले के बाद कैसे हो राजनीतिक दलों की फंडि
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि राजनीतिक चंदे को लेकर भविष्य में कौन सी ऐसी व्यवस्था लागू हो जिसकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े ना हो ? सवाल यह भी है कि बीते गुरुवार को देश की सबसे ऊंची अदालत के निर्णय के बाद राजनीतिक दलों की फंडिंग आगे किस तरह से होगी और क्या बॉन्ड्स को असंवैधानिक मात्र करार देने से सब कुछ ठीक हो जाएगा? सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ ने केंद्र की मोदी सरकार के साल 2018 में ले गए एलेक्टोरल बॉन्ड स्क्रीम को गैर कानूनी करार दिया है क्योंकि इसके तहत चंदा देने वाले की पहचान गुप्त रखी जा सकती थी. सरकार की स्कीम को अदालत में चैलेंज करने वालों का कहना था कि इसमें काला धन को सफेद किए जाने से लेकर, किसी काम को किए जाने के समझौते के तहत बड़ी कंपनियों या व्यक्तियों से चंदा लिया जा सकता है.
एलेक्टोरल बॉन्ड्स क्या होते हैं ?
केंद्र सरकार ने 2017 में एलेक्टोरल बॉन्ड्स स्क्रीम को पेश करके 29 जनवरी, 2018 को कानूनी रूप से लागू किया था. यह स्कीम राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय जरिया है . इस स्कीम के तहत भारत की कोई भी कंपनी या नागरिक भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से एलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीद सकता है.
कांग्रेस ने क्या कहा ?
एलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी सार्वजनिक करने को लेकर एसबीआई को और समय न दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कांग्रेस पार्टी ने स्वागत किया है . बेंगलुरु में तो युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एसबीआई शाखा के बाहर जोरदार प्रदर्शन भी किया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एलेक्टोरल बॉन्ड के मुद्दे पर एसबीआई को सुप्रीम कोर्ट से मिले झटके के बाद कहा है कि नरेंद्र मोदी के चांदी के धंधे की पोल खुलने वाली है. राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, 100 दिन में स्विस बैंक से काला धन लाने का वायदा करके सत्ता में आएगी सरकार अपने ही बैंक का डेटा छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सिर के बल खड़ी हो गई”. राहुल गांधी ने कहा,” एलेक्टोरल बॉन्ड भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला साबित होने जा रहा है, जो भ्रष्ट उद्योगपतियों और सरकार के नेक्सस की पोल खोलकर नरेंद्र मोदी का असली चेहरा देश के सामने आएगा.
” क्रोनोलॉजी स्पष्ट है — चंदा दो –
धंधा लो, चंदा दो — प्रोटक्शन लो.

चंदा देने वालों पर कृपा की बौछार और जनता पर टैक्स की मार, यही है भाजपा की मोदी सरकार”. उधर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ” एलेक्टोरल बॉन्ड प्रकाशित करने के लिए एसबीआई द्वारा साढ़े चार महीने मांगने के बाद साफ हो गया था कि मोदी सरकार अपने काले कारनामों पर पर्दा डालने की हर संभव कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा,मीडिया रिपोर्ट्स से यह उजागर हुआ है कि भाजपा किस तरह ईडी, सीबीआई और आईटी रेड डलवाकर जबरन चंदा वसूलती थी. सुप्रीम कोर्ट का फैसला पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतंत्र में बराबरी के मौके की जीत है. दरअसल सुप्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने एडीआर की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया पर अदालत की अवमानना का मामला दायर किया था. प्रशांत भूषण ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की ओर से एसबीआई पर अदालत के पहले के फैसले की तरह इसे बढ़िया और ठोस फैसला बताया है.