बिहार में बंटवारे मुद्दे पर कांग्रेस और आरजेडी का रिश्ता आईसीयू में पहुंच गया है. लालू यादव एक के बाद एक लोकसभा सीट पर प्रत्याशियों के नाम का एलान करते जा रहे हैं जबकि कांग्रेस ने सब कुछ हालात पर छोड़ दिया है. राहुल गांधी खफा है .आरजेडी से बात भी दूसरे नेता कर रहे हैं.
हैदराबाद से राजनीतिक संवाददाता देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट .
नई दिल्ली/ पटना/हैदराबाद, 29 मार्च, 2024. सीट बंटवारे के मुद्दे पर बिहार में कांग्रेस और राजद का रिश्ता आईसीयू में पहुंच गया है लालू प्रसाद यादव धड़ाधड़ सिंबल बांट रहे हैं और कांग्रेस मुंह बाए खड़ी है . राहुल गांधी खफा है . सब कुछ हालात पर छोड़ दिया है. आरजेडी से बात भी दूसरे नेता कर रहे हैं. खुद हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है . अब दो बातों का इंतजार है . गठबंधन तोड़ने का या राजद के सामने घुटने टेकने का.लालू यादव ने अपनी ओर से संबंध की इतिश्री कर दी है . इससे नीतीश कुमार को दरकिनार भाजपा से मुकाबला करने के लिए लालू यादव पर भरोसा जताने वाली कांग्रेस हतप्रभ हैं. पटना में विपक्षी एकता की पहली बैठक के दौरान राहुल गांधी को दूल्हा और खुद बाराती बनने का वादा करने वाले लालू प्रसाद यादव से कांग्रेस को एक-एक सीट की याचना करनी पड़ रही है . फिर भी कोई भाव नहीं. उल्टे आरजेडी उन सीटों पर भी प्रत्याशी उतारते जा रहा है, जिस पर कांग्रेस को मजबूत माना जाता है. निखिल कुमार की औरंगाबाद सीट छीन ली गई है . अब पूर्णिया- कटिहार की बारी है. पूर्णिया से टिकट के दावेदार पप्पू यादव ने अपने दल के कांग्रेस में विलय से पहले लालू – तेजस्वी से सहमति ली थी . फिर भी खाली है. तारिक अनवर को कटिहार के लिए तरसाया जा रहा है. कांग्रेस के साथ राजद ने ऐसा स्वरूप पहली बार नहीं किया है. दोस्ती बरकरार रही तो आखरी बार भी नहीं होगा. विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया गांधी का आगे बढ़कर साथ देने वाले लालू प्रसाद यादव ने यूपीए सरकार में केंद्र में पांच साल तक मंत्री रहने के बावजूद 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बिहार में दरवाजा दिखा दिया था. गठबंधन तोड़कर रामविलास पासवान की पार्टी के साथ सभी सीटों पर प्रत्याशी उतार दिए थे और कांग्रेस अकेली रह गई थी. 2 साल पहले बिहार में उपचुनाव में राजद ने कांग्रेस को दरकिनार कर दिया था .
स्ट्राइक रेट का एग्जाम भी कांग्रेस पर लगाया था
साल 2020 में बिहार में राजद की सरकार नहीं बन पाने का इल्जाम भी कांग्रेस पर ही थोपा जाता है . बिहार विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत कांग्रेस को 243 में से 70 सीटें दी गई थी. इनमें 51 पर हार हुई थी, जिसके लिए कांग्रेस को आज तक जलील किया जाता है, जबकि सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस को वैसी सीटें अधिक मिली थी, जहां का समीकरण भाजपा- जदयू के अनुकूल था. हारना तो तय था . इसी नतीजे को नजीर बनाकर कांग्रेस को स्ट्राइक रेट की याद दिलाई जाती है, पर 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे को भुला दिया जाता है. कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने आरजेडी से सवाल किया है कि 20 सीटों पर लड़ने वाले राजद को एक सीट भी नहीं मिली थी, लेकिन 9 सीटों पर लड़ते हुए कांग्रेस ने एक सीट जीत ली तो स्ट्राइक रेट किसका अच्छा हुआ ? 2014 का नतीजा भी आईना दिखाता है . दोनों दल साथ थे. 27 सीटों पर लडकर आरजेडी को 4पर जीत मिली, लेकिन 12 सीटों पर लड़का कांग्रेस ने 2 सीटें जीत ली थी. यहां भी कांग्रेस का स्ट्राइक रेट आरजेडी से बेहतर था.
क्या दुर्गति के लिए खुद कांग्रेस जिम्मेदार हैं ?
कभी बिहार में कांग्रेस की तूती बोलती थी. आजादी से लेकर 1990 तक कांग्रेस ने 16 मुख्यमंत्री दिए, लेकिन सत्ता के लालच में राजद की गोद में बैठकर दयनीय दशा में पहुंच गई. वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में राजद के खिलाफ लड़का कांग्रेस को 23 सीटें मिली थी. जनादेश था विपक्ष में बैठने का . किंतु लालच प्रबल हो गया . सारे विधायक राबड़ी सरकार में शामिल हो गए. एक स्पीकर और बाकी सब मंत्री. कांग्रेस ने विपक्ष का जगह रिक्त कर दिया, जिसे भाजपा – जदयू ने भरा. कांग्रेस तभी से निर्वासित है और आरजेडी की पिछलग्गू बनी हुई है.
मुस्लिम वोट के लिए चूहे – बिल्ली का खेल
कांग्रेस बिहार में उचित हिस्सेदारी चाहती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार को राजद का प्रयास ईमानदार नहीं दिखता है. कहते हैं कि राजद मुस्लिम – यादव समीकरण वाली सीटों से कांग्रेस को दूर रखना चाहता है. उसे डर है कि कांग्रेस को ज्यादा सीटें न मिल जाए.