मोहन भागवत ने कहा– जाति व्यवस्था’ गलती’ और ‘ पंडितों की रचना’ है

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्वंयसेवकों से सामाजिक भेदभाव खत्म करने के लिए कहा है. उन्होंने’ एक मंदिर, एक कुआं, एक शमशान ‘ सभी के लिए होने की बात कही है.

नई दिल्ली/ हैदराबाद, 5 मई, 2025 . राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में अलीगढ़ में दिए एक भाषण में अपने स्वयंसेवकों से सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए काम करने को कहा है. उनका कहना था कि इससे सामाजिक सद्भाव बना रहेगा. उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए ‘ एक मंदिर, एक कुआं, एक शमशान ‘ सभी के लिए होना चाहिए. लेकिन खबरों के मुताबिक, भागवत जाति व्यवस्था और जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने की बात कर रहे थे. यह पहली बार नहीं है जब आरएसएस सरसंघचालक ने जाति और ‘ वर्ण ‘ व्यवस्था को खत्म करने की बात कही है . अक्टूबर 2022 में भी उन्होंने कहा था कि जाति व्यवस्था पुरानी हो चुकी है और सामाजिक सद्भाव के लिए इसे भूल जाना चाहिए. उस समय भागवत ने कहा था कि जाति व्यवस्था को हमारे पूर्वजों ने गलती से अपनाया था . अब जब हमें गलती का एहसास हो गया है, तो राष्ट्रीय एकता के हित में इसे छोड़ देना चाहिए . कुछ महीने बाद, भागवत ने कहा कि भगवान के सामने सब बराबर है. उन्होंने कहा, हमारे निर्माता के लिए हम सब बराबर हैं. कोई जाति या संप्रदाय नहीं है.ये अंतर हमारे पंडितों ने बनाए हैं. “

भागवत जाति व्यवस्था को खत्म करने में दिलचस्पी नहीं रखते ?

जाति पर भागवत के इस बयान के बाद कई तरह की प्रक्रियाएं आ रही है. यह बयान सरकार द्वारा जाति जनगणना कराने की घोषणा के कुछ दिन पहले ही आया है. सरकार का यह फैसला विपक्ष के दबाव के बाद आया है. कुछ लोगों का मानना है कि भागवत हिंदुओं को राजनीतिक रूप से एकजुट करने में ज्यादा रुचि रखते हैं. उन्हें जाति व्यवस्था खत्म करने में कम दिलचस्पी है.वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि जब आरएसएस प्रमुख जैसा कोई व्यक्ति सामाजिक बदलाव की बात करता है, तो इस पर ध्यान देना चाहिए और इसे बढ़ावा देना चाहिए.

लाख टके का सवाल – संघ के लोग भागवत की बात मानेंगे ?

तो, भागवत ने यह बात कह दी है, अब आगे क्या होगा? जिस संगठन पर अक्सर ब्राह्मणों का वर्चस्व होने का आरोप लगता रहा है, उसके प्रमुख का जाति व्यवस्था को खत्म करने की बात करना और यह मानना कि यह पूरी व्यवस्था एक गलती थी और पंडितों ने बनाई थी, महत्वपूर्ण है. लेकिन क्या वह इस पर अमल करने को तैयार हैं ?

भागवत की बातों पर संदेह क्यों ?

भागवत की बातों पर संदेह इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने मस्जिदों में मंदिरों को खोजने के लिए खुदाई करने के खिलाफ भी कहा था. लेकिन उनके समर्थकों ने उनकी इस बात को अनसुना कर दिया. आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने भी एक इंटरव्यू में ऐसा ही कहा कि,” अगर हम इतिहास को बदलने के लिए सभी मस्जिदों की खुदाई शुरू कर देंगे, तो क्या इससे समाज में और दुश्मनी और नफरत नहीं पैदा होगी? आप इतिहास में कितना पीछे जाएंगे ? ” हालांकि, भागवत और होसबोले के बयानों के बावजूद मस्जिदों पर मुकदमे चल रहे हैं. अजमेर शरीफ और उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद पर विवाद चल रहा है. संभल की मस्जिद पर विवाद के कारण सांप्रदायिक हिंसा भी हुई थी.

छुआछूत मिटाने की बात संविधान में है, फिर भी भेदभाव कायम

डॉ बी आर अंबेडकर की जीवनी लिखने वाले दलित स्कॉलर आनंद तेलतुंबडे कहते हैं कि आरएसएस प्रमुख का ‘ एक मंदिर, एक कुआं, एक शमशान ‘ का आह्वान पहले से ही संविधान के अनुच्छेद 17 में शामिल है. यह अनुच्छेद किसी भी रूप में छुआछूत के अभ्यास को प्रतिबंधित करता है. इसके बावजूद, भारत में जाति आधारित भेदभाव व्यापक है. तेलतुंबडे ने यह भी कहा कि आरएसएस प्रमुख जो कह रहे हैं, उसकी तुलना अंबेडकर के जाति व्यवस्था को खत्म करने के आह्वान से नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा,” अंबेडकर जाति को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते थे. अंबेडकर ने बाद में इसे सामाजिक और आर्थिक समानता के रूप में परिभाषित किया.”

जाति व्यवस्था के लिए पुजारियों को दोष देना काफी नहीं

तेलतुंबडे ने भागवत के इस दावे का जिक्र करते हुए कहा कि जाति’ पंडितो ‘ द्वारा बनाई गई एक कृत्रिम रचना है, कह कि केवल पुजारियों को दोष देना काफी नहीं है. उन्होंने कहा, ” पुजारियों ने शास्त्रों का पालन किया. जातियों को खत्म करने के लिए आरएसएस को इन शास्त्रों को त्यागना होगा .” भागवत पहले आरएसएस प्रमुख नहीं है जिन्होंने जाति को खत्म करने की वकालत की है . आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने 1983 में’ सामाजिक समरसता ‘ शब्द दिया था. उन्होंने इस उद्देश्य के लिए सामाजिक समरसता मंच की स्थापना भी की. समरसता मंच सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता है जिसमें विभिन्न जातियों के लोगों को आमंत्रित किया जाता है. बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार समीर मिश्रा कहते हैं कि आरएसएस द्वारा हिंदू एकता पर लगातार जोर देना केवल हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास है. उन्होंने कहा, ” इसका जातिगत भेदभाव को खत्म करने से कोई लेना-देना नहीं है. सतरूढ भाजपा ने वर्षों तक जाति जनगणना का विरोध किया क्योंकि उसे डर था कि इसे हिंदू विभाजित हो जाएंगे, जिससे वे स्पष्ट रूप से टालना चाहते हैं. “