
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट
अमेरिका ने कहा है कि उपराष्ट्रपति जेडी बेंस ने युद्धविराम पर पीएम मोदी से बात की थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की इन्हीं शब्दों में व्याख्या की थी. 10 मई को शाम 5 बजे जब ट्रंप ने युद्धविराम की अचानक घोषणा की तो यह कई तरह से असहज करने वाला था
नई दिल्ली/ हैदराबाद, 12 मई, 2025. ट्रंप ने इसकी घोषणा सोशल मीडिया पर की और भारतीयों को युद्धविराम की पहली जानकारी भारत या पाकिस्तान से नहीं बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति से मिली. अमेरिका ने केवल जानकारी ही नहीं दी बल्कि कई ऐसी बातें कही जो भारत की विदेश नीति के उलट है . जैसे ट्रंप ने पोस्ट में लिखा था, ” अमेरिका ने पूरी रात पाकिस्तान और भारत के बीच मध्यस्थता की और इसके बाद दोनों देश पूर्ण और तत्काल युद्ध विराम पर सहमत हो गए हैं. ” भारत की यह नीति रही है कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मसला है और इसमें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है. भारत किसी भी द्विपक्षीय विवाद में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज करते रहा है. चीन के साथ सीमा विवाद में भी भारत की यही नीति है . अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने जुलाई 2019 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान के सामने कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश की थी. तब ट्रंप की इस पेशकश को भारत में तत्काल खारिज कर दिया था. लेकिन बात केवल ट्रंप की नहीं है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी युद्ध विराम को लेकर एक्स पर जो पोस्ट में लिखा था, उसमें कुछ ऐसी बातें थी, जिन पर सवाल उठ रहे हैं. जैसे रूबियो ने लिखा है कि भारत और पाकिस्तान विवादों को सुलझाने के लिए किसी तीसरे देश में बात करेंगे.
भारत ने अमेरिकी घोषणा पर गर्मजोशी नहीं दिखाई
अमेरिका की तरफ से युद्ध विराम की घोषणा पर भारत की तरफ से जो प्रक्रिया आई, वो बहुत गर्मजोशी वाली नहीं थी. एस. जयशंकर ने ट्रंप और रबियो की घोषणा के बाद एक्स पर जो लिखा, उससे साफ दिख रहा था कि घोषणा को लेकर दोनों देशों में बहुत समन्वय नहीं था या भारत अमेरिकी घोषणा की हर बात से बहुत सहमत नहीं था. जयशंकर ने अपनी पोस्ट में कहीं भी अमेरिका का नाम नहीं लिया है कि उसने युद्ध विराम के लिए मध्यस्थता की. भारतीय विदेश मंत्री लिखा है, ” भारत-पाकिस्तान गोलीबारी और सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए एक सहमति पर पहुंचे हैं. आतंकवाद के खिलाफ भारत समझौता नहीं करेगा और यहीं रुक आगे भी रहेगा. ” जयशंकर की इस पोस्ट को मार्को रुबियो ने रीपोस्ट किया है लेकिन दोनों की बातों में फर्क साफ दिख रहा है. भारतीय विदेश मंत्री ने कहीं नहीं कहा है कि अमेरिका की मध्यस्थता में युद्ध विराम हुआ है और भारत किसी न्यूट्रल साइट पर विवाद को सुलझाने के लिए पाकिस्तान से बात करेगा. दूसरी तरफ अमेरिका की इस घोषणा पर पाकिस्तान ने गर्मजोशी दिखाई और डोनाल्ड ट्रंप को शुक्रिया कहा . भारत के पूर्व डिप्लोमैट जी पार्थ सारथी कहते हैं, ” अगर ट्रंप की भाषा को आधार बनाएंगे तो भारत के लिए असहज करने वाला है. लेकिन इसे दूसरे तरीके से देखने की जरूरत है. ट्रंप का आकलन भाषा और भाषण के आधार पर नहीं होना चाहिए. असल में क्या होता है, हमें वो देखना चाहिए. पाकिस्तान के पंजाब तक में हमला कर देना क्या बिना ट्रंप की हरी झंडी के हुआ है? जाहिर है कि ट्रंप का ग्रीन सिग्नल था. भारत ने अपना मकसद हासिल कर लिया है और इसके बाद युद्धविराम की घोषणा कोई भी करें इससे क्या फर्क पड़ता है. ” पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका में भारत की राजदूत रही निरुपमा मेनन राव मानती है कि ट्रंप ने पूरे मामले में भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही तराजू पर रखने की कोशिश की है .
भारत-पाकिस्तान एक ही तराजू पर ?
निरुपमा राव ने एक्स पर लिखा है, ” 10 मई को राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में युद्ध विराम के लिए एक स्वर में जिस तरह से पाकिस्तान और भारत की प्रशंसा की है, उसे दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स की जटिलता साफ झलकती है. ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही तराजू पर रखा जबकि चीन को काउंटर करने के मामले में भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है और इस क्षेत्र में भारत की भूमिका ज्यादा बड़ी है.
