पंजाब से केरल तक जातिवाद

पवित्रता और अपवित्रता की धारणाओं पर आधारित जाति व्यवस्था ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई जिसमें अछूतों को अमानवीय माना जाता था और उनके स्पर्श को मृत्यु से भी अधिक खतरनाक संदूषक समझा जाता था.

नई दिल्ली/ हैदराबाद, 22 मई, 2025. 1930 का दशक भारत के लिए एक जटिल दौर था, जहां स्वतंत्रता संग्राम के साथ – साथ जाति व्यवस्था की गहरी जड़ें सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रही थी. अछूतों के प्रति भेदभाव, जो सदियों पुरानी” पवित्रता ” और ” अपवित्रता ” की धारणा पर आधारित था, ने लाखों लोगों को अमानवीय स्थिति में धकेल रखा था. उस समय के समाचार पत्रों जैसे यंग इंडिया, प्रकाश, बॉम्बे समाचार और आदि हिंदू में दर्ज घटनाएं दर्शाती है कि हिंदू समाज में मानवता, करुणा और नैतिकता से अधिक जातिगत पवित्रता को महत्व दिया जाता था. अछूतों, जिन्हें हरिजन या दलित कहा जाता था, को मंदिरों, कुओं, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों से बहिष्कृत किया जाता था . उन्हें अलग- थलग बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया जाता था, जाति हिंदुओं द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं को छूने से रोक दिया जाता था, और जातिगत नियमों के मामूली उल्लंघन के लिए हिंसा का शिकार बनाया जाता था. महात्मा गांधी जैसे सुधारकों ने हरिजनों के उत्थान की वकालत की, लेकिन उनके प्रयासों को अक्सर रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा , जो पारंपरिक पदानुकर्मों से चिपके रहे. डॉ आंबेडकर, जो स्वयं एक दलित थे, इस व्यवस्था के कटु आलोचक थे . उन्होंने तर्क दिया कि अछूतपन केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि एक नैतिक और राजनीतिक विफलता भी है. सामाजिक न्याय और अधिकारिकता मंत्रालय के तहत डॉ आंबेडकर फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर: लेखन और भाषण: खंड संख्या 5 ‘ के अध्याय 5 में वर्णित कुछ मार्मिक घटनाएं शामिल है, जो दिखती है कि हिंदू अछूत को छूने से ज्यादा अमानवीय होना पसंद करेंगे. इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि एक अछूत हिंदुओं के लिए कितना अशुद्ध और संगति के अयोग्य माना जाता था. यंग इंडिया के 12 दिसंबर 1929 के अंक में काठियावाड़ के एक गांव के एक अछूत स्कूल शिक्षक की मार्मिक कहानी प्रकाशित हुई . 5 दिसंबर को उनकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन 7 दिसंबर को वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई. उन्हें दस्त, सीने में सूजन और सांस लेने में तकलीफ होने लगी. शिक्षक ने स्थानीय हिंदू डॉक्टर से मदद मांगी, लेकिन डॉक्टर ने हरिजन बस्ती में आने या बच्चे की जांच करने से साफ इनकार कर दिया . नागर सेठ और गरासिया दरबार जैसे गणमान्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप और 2 रुपए की फीस के आश्वासन के बाद, डॉक्टर ने हरिजन बस्ती के बाहर मरीज को देखने की शर्त रखी. शिक्षक को अपनी बीमार पत्नी और नवजात बच्चे को बस्ती से बाहर लाना पड़ा. डॉक्टर ने थर्मोमीटर एक मुस्लिम व्यक्ति के जरिए शिक्षक को सौंपा, जिसे शिक्षक ने अपनी पत्नी को दिया और फिर उसी तरह वापस किया . रात के 8 बजे, दीए की रोशनी में थर्मामीटर देखकर डॉक्टर ने निमोनिया का निदान किया और दवा भेज दी. लेकिन 2 रुपए की फीस लेने के बावजूद, डॉक्टर ने बाद में मरीज को देखने से मना कर दिया. शिक्षक बाजार से अलसी लाकर पत्नी पर लगाई, लेकिन दोपहर 2 बजे उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई. शिक्षक ने लिखा, ” मेरे जीवन का दीपक बुझ गया. ” यह घटना दिखाती है कि एक शिक्षित डॉक्टर ने अपनी पेशेवर जिम्मेदारी को नजरअंदाज कर जातिगत भेदभाव को चुना, जिसके कारण एक मां और बच्चे की जान चली गई. ग्रामीण इलाकों में अछूतों के लिए बने वो क्रूर नियम जिस पर डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने लिखा—” शुक्र है कि संविधान सभा ने गांव को… ” बाबा साहेब के मुताबिक, हिंदू गांव अछूतों के लिए एक ” जातीय बस्ती” था, जहां उन्हें अमानवीय व्यवहार और शोषण का सामना करना पड़ता था. गांवों की यह व्यवस्था न केवल सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती थी, बल्कि अछूतों को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से दबाए रखती थी. संविधान सभा में भी कई हिंदू सदस्यों ने गांवों को संवैधानिक ढांचे का आधार बनाने की जोरदार वकालत की थी . लेकिन बाबा साहेब अंबेडकर ने इसे अछूतों के लिए एक ” बड़ी आपदा” माना. संविधान सभा द्वारा इस व्यवस्था को अस्वीकार करना अछूतों के लिए एक बड़ी राहत थी . ने इस व्यवस्था को उजागर कर हिंदू समाज की कट्टरता और अछूतों के प्रति उसके व्यवहार की सच्चाई को सामने ला दिया.