तेलंगाना – कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता की अंदरूनी रस्साकशी

कांग्रेस के लिए दक्षिण के दो महत्व पूर्ण राज्यों कर्नाटक और तेलंगाना में अपनी सरकारों में चल रहे सत्ता सियासत की अंदरुनी रस्साकशी को साधना आसान नहीं हो रहा है. साथ ही कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम सह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच चल रहा सत्ता पर नियंत्रण का दांव — पेंच पार्टी नेतृत्व की सिरदर्दी बना हुआ है.

नई दिल्ली/ बेंगलुरु/ हैदराबाद, 14 जून, 2025. कांग्रेस के लिए दक्षिण के दो महत्वपूर्ण राज्यों कर्नाटक और तेलंगाना में अपनी सरकारों में चल रहे सत्ता सियासत की अंदरुनी रस्साकशी को साधना आसान नहीं हो रहा है. कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम सह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच चल रहा सत्ता पर नियंत्रण का दांव — पेंच पार्टी नेतृत्व की सिरदर्दी बना हुआ है .

कांग्रेस के लिए चुनौती घरेलू कलह
वहीं, तेलंगाना में भी नेताओं — विधायकों की सत्ता में हिस्सेदारी के जोर मारते उबाल को थामे रखना चुनौती के रूप में उभर रही है. मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की अपनी कैबिनेट के पहले बहु प्रतीक्षित बिस्तर में भी इसकी झलक दिखी जब 6 की जगह 3 विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई और भविष्य की सियासत को साधने का विकल्प बना रहे. तेलंगाना और कर्नाटक की कांग्रेस सरकारों के लिए अपने स्थानीय नेताओं की दावेदारी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की स्वाभाविक चुनौतियां तो है ही. साथ ही उनके सामने दोहरी चुनौती कांग्रेस की राष्ट्रीय सियासत में नीतिगत तथा राजनीतिक विमर्श को भी जगह देना है.

कर्नाटक की 215 की जातीय जनगणना रिपोर्ट ठंढे बस्ते में
जातीय जनगणना तथा आबादी के हिसाब से भागीदारी का राहुल गांधी का सामाजिक न्याय के एजेंडे की सियासत को आगे बढ़ना. इसमें जाहिर तौर पर दोनों सरकारों के लिए प्राथमिकता में है. कर्नाटक की 2015 की जातीय जनगणना रिपोर्ट को ठंढे बस्ते में डालकर नए सिरे से सामाजिक- आर्थिक आधार पर जातिवार जनगणना कराने की घोषणा हो या फिर तेलंगाना में पिछले रविवार को हुआ कैबिनेट विस्तार में शामिल किए गए तीन मंत्रियों का चयन सब कुछ इसी हिसाब से हुआ है. तेलंगाना में जिन तीन विधायकों को मंत्री बनाया गया है, उसमें दो दलित तथा एक ओबीसी वर्ग के हैं. जबकि अनुसूचित जनजाति वर्ग को साधने के लिए रामचंद्र नायक को विधानसभा का डिप्टी स्पीकर बनाया गया है.

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी कांग्रेस हाईकमान को राजी नहीं कर पाए

बताया जाता है कि इसी क्रम में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी तमाम प्रयासों के बावजूद अपनी एक पसंद पी. सुदर्शन रेड्डी को मंत्री बनाने के लिए हाईकमान को राजी नहीं कर पाए. दरअसल, मंत्रिमंडल विस्तार के लंबे समय से लटकने की वजह तेलंगाना के पुराने कांग्रेसी नेताओं तथा मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी समर्थकों की दावेदारी ही नहीं पार्टी की सामाजिक न्याय की राजनीति का नया दांव – पेंच भी रहा. यही वजह रही कि मार्च महीने की आखिरी में पार्टी हाई कमान से हरी झंडी मिल जाने के बावजूद रेवंत रेड्डी को अपने मंत्रिमंडल विस्तार के लिए 2 महीने लग गए और फिर भी अपनी पसंद का एक भी चेहरा शामिल नहीं कर पाए.

अंदरूनी खींचतान कांग्रेस पर भारी ना पड़ जाए
दिलचस्प यह भी है कि रेवंत रेड्डी जिस सुदर्शन रेड्डी को कैबिनेट में लाकर गृह मंत्री बनना चाहते थे उनका प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी. महेश कुमार गौड़ भी विरोध कर रहे थे. वहीं, विधानसभा चुनाव के समय
सत्ता में भागीदारी की महत्वाकांक्षा से कांग्रेस में वापस लौटे कोमाटिरेड्डी राजगोपाल रेड्डी जैसे कुछ विधायकों को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है और ऐसे में अंदरूनी खींचतान सहजता से थमने के आसार नहीं है. शायद इसके मद्देनजर ही तेलंगाना मंत्रिमंडल के तीन पद रिक्त रखे गए हैं ताकि सियासी चुनौती जैसे-जैसे करवट लेगी उसी हिसाब से नेताओं को साधने का प्रयास किया जाएगा.