पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा

त्रिदेवों — भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को 12वीं शताब्दी के मंदिर से पहांडी में बिठाकर मंदिर के सिंह द्वारा के सामने खड़े उनके संबंधित रथों तक ले जाया जाता है. इस दौरान भव्य जुलूस निकलता है. सिंह द्वारा से भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के रथों को खींचकर श्री गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है, जो पुरी जगरनाथ मंदिर से लगभग 2.6 किमी दूर है.

पुरी / हैदराबाद, 27 जून, 2025 ओड़िशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू हो गई है, जिसे ‘ पहांडी ‘ अनुष्ठान कहा जाता है. देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु रथ यात्रा जुलूस में शामिल होने के लिए पुरी शहर में जुटे हैं. त्रिदेवों — भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को 12वीं शताब्दी के मंदिर से पहांडी में बिठाकर मंदिर के सिंह द्वारा के सामने खड़े उनके संबंधित रथों तक ले जाया जाता है. इस दौरान भव्य जुलूस निकलता है. सिंह द्वारा से भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के रथों को खींचकर श्री गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है, जो पुरी जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2.6 किमी दूर है. गुंडिचा मंदिर महाप्रभु जगन्नाथ, उनके भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के मौसी का घर माना जाता है. मंगल आरती और विधि विधान से पूजा पाठ करने के बाद भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को 12वीं शताब्दी के मंदिर से निकाल कर सिंह द्वार पर खड़े उनके रथों नंदी घोष, दर्पदलन और तालध्वज पर विराजमान किया गया. वहीं भोई राजवंश के राजा ने रथ यात्रा के रास्ते को सोने के झाड़ू से बुहारा. इसके बाद भक्तों ने सबसे पहले भगवान बलभद्र का रथ खींचना शुरू किया. कुछ दूर ले जाकर उनके रथ को रोक दिया गया. फिर देवी सुभद्रा के रथ को खींचना शुरू किया और आखिर में महाप्रभु जगन्नाथ के रथ को खींचा गया. रथ यात्रा के लिए अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए गए.ओड़िशा पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, और अन्य सुरक्षा बलों के लगभग 10 हजार जवानों की तैनाती के बीच रथ यात्रा आयोजित की गई. इस बीच ओड़िशा के पुलिस महानिदेशक वाई बी खुरानिया ने कहा,’ हमने रथ यात्रा के सुचारू संचालन के लिए हर संभव व्यवस्था की है. 275 से अधिक एआई — इनेबल्ड सीसीटीवी कैमरों के जरिए रथ यात्रा की निगरानी की गई. श्री सुदर्शन के पीछे भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई भगवान बलभद्र थे और बहन देवी सुभद्रा को सेवायतों द्वारा’ सूर्य पहांडी ‘( रथ पर ले जाते समय देवी आकाश की ओर देखती हैं ) नामक विशेष जुलूस में उनके ‘ दर्पदलन ‘ रथ पर विराजमान कराया गया. घंटियां, शंख झाँझ बजाते हुए चक्र राज सुदर्शन को सबसे पहले मुख्य मंदिर से बाहर निकाला गया और देवी सुभद्रा के ‘ दर्पदलन ‘ रथ पर विराजित किया गया. श्री सुदर्शन भगवान विष्णु का चक्र अस्त्र है. पुरी में विराजमान महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान विष्णु के ही रूप हैं.

जगन्नाथ रथ यात्रा हैदराबाद – 225
जगन्नाथ रथ यात्रा 225 हैदराबाद में भी 27 जून को शुरू हुई. यह यात्रा श्री जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ होकर शहर के प्रमुख मार्गो से होकर गुजरी. हैदराबाद और पूरी की जगन्नाथ रथ यात्राओं में मुख्य अंतर उनका धार्मिक महत्व और व्यापकता है. पुरी की रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ,देवी सुभद्रा और बलभद्र की मूर्तियों को 9 दिनों तक रथों में निकाल कर ओड़िशा के पुरी शहर में आयोजित एक बड़ा और धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण त्यौहार है, जो लाखों भक्तों को आकर्षित करता है. वहीं हैदराबाद की रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ के सम्मान में एक स्थानीय उत्सव है, जो पूरी की यात्रा जितना व्यापक तो नहीं है, लेकिन इसकी भी अपनी मान्यता है. यह उत्सव हैदराबाद नगर में मनाया जाता है और स्थानीय समुदाय द्वारा भगवान की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता है, भक्त इस यात्रा में बढचढ़कर भाग लेते हैं और अपने आप को प्रभु के दर्शन से धन्य करते हैं. जानकारी के मुताबिक, इस रथ यात्रा की शुरुआत यहां छोटे स्तर पर हुई, जब कुछ समर्पित भक्तों ने मिलकर भगवान के रथ को मंदिर से बाहर निकाल कर शहर में निकाला. खासकर इस्कॉन के कुकटपल्ली, राजेंद्र नगर के अतापुर – पांडुरंगा नगर और कांटेदान जैसे धार्मिक समस्थानों ने इस यात्रा को व्यवस्थित रूप दिया और इसे वर्षों तक निरंतर चलाया. हैदराबाद की रथ यात्रा न केवल भक्तों को जोड़ती है, बल्कि यहां की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सौहार्द का परिचय कराती है.
हैदराबाद में मुख्य रूप से जगन्नाथ रथ यात्रा बंजारा हिल्स के रोड नंबर 12 में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलती है. भक्तों का मानना है कि रक्त खींचने से पापों का नाश होता है और भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त होता है.