कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

भगवान श्री कृष्ण के जीवन को ज्योतिष के आधार पर देखें तो सवाल उठता है कि आखिर उनका जन्म किस तिथि, मुहूर्त और नक्षत्र व लग्न में हुआ था, जो उन्हें इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ा.


मथुरा/ द्वारकापुरी / हैदराबाद, 16 अगस्त, 2025. श्री राम के बाद, श्री कृष्ण ही भारतीय समाज के वह प्रथम पुरुष हैं जिन्होंने मनुष्य को जो सिर्फ जीवन जीना सिखाया, बल्कि जीवन कैसे जिया जाता है उसे उसी अनुसार जीकर भी दिखाया. हम भले ही उन्हें भगवान मानकर पूजा करें, लेकिन श्री कृष्ण के जीवन का उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने जीवन की सार्थकता को समझें और धरती पर जितना भी जीवन बिताए, उसे अहम मानकर बिताए, वेदों में जिस ‘ अहं ब्रह्मास्मि ‘ सूत्र की कल्पना की गई है, श्री कृष्णा उसके साकार स्वरूप हैं. इसे इस तरह देखना चाहिए कि धरती पर जन्म लेने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन के कर्मों से ईश्वर बन सकता है.

अनगिनत उलझनों से भरा हुआ था श्री कृष्ण का जीवन
श्री कृष्ण के जीवन को भगवान वाले नजरिए से इतर देखें तो उनका जीवन कितने ही उलझनों
से भरा हुआ नजर आता है. अगर ऐसी परेशानियां आज किसी के जीवन में आ जाएं तो वह जीवन से सरल मरण को समझेगा. श्री कृष्ण के जीवन की दुश्वारियों को देखिए, उनका जन्म कारागार में हुआ. जन्म लेते ही माता-पिता से बिछड़ना पड़ा. भाग्य ने सिर्फ एक अच्छाई दिखाई कि जो परिवार मिला उसने उन्हें अपना प्राण ही मानकर पाला और बड़ा किया.

पूतना समेत कई राक्षसों ने की करने की कोशिश
फिर भी बचपन तो हमेशा मृत्यु के खतरे में ही बीता. दूध में विष दिया गया. बैलगाड़ी के नीचे कुचलने की कोशिश हुई. वन की आग में जलने की प्रयास किया गया. राक्षसों ने सीधा आक्रमण करके मारने की कोशिश में लगा रहा. इसके बाद जीवन में कभी पलायन का दुख आया, खुद की लड़ाई, कभी संबंधियों के युद्ध, शाप भी झेले और द्वंद्व भी. लेकिन फिर भी आपको कृष्ण के जीवन में दुख नहीं सुनाई देते हैं, सुनाई देती है सिर्फ और सिर्फ मुरली की मनोहर तान…

भारतीय संस्कृति के आधार हैं श्री कृष्णा

आज मनुष्य श्री कृष्ण के जैसे जीवन का एक अंश भी नहीं जी रहा है. फिर भी श्री कृष्ण के जीवन ज्योतिष के आधार पर देखें तो सवाल उठता है कि आखिर उनका जन्म किस तिथि, मुहूर्त और नक्षत्र व लग्न में हुआ था, जो उन्हें इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इस विषय पर ज्योतिष की जानकारी रखने वाले प्रसिद्ध ज्योतिषी मनीष मिश्रा बहुत ही विस्तार से बताते हैं. वह कहते हैं कि, श्री कृष्णा भारतीय संस्कृति के आधार हैं . वह भले ही अजन्मा और अव्यक्त कहे जाते हैं, लेकिन उन्होंने धरती के पाप को हरने के लिए मनुष्य रूप में जन्म लिया था. जिसे अवतार की दृष्टि से देखा जाता है, फिर भी राम और कृष्णा ने खुद ही अपने लिए मर्यादा बांधी थी.

जो खुद नक्षत्र नियंता हैं, उनके जीवन में था नक्षत्र का प्रभाव
इसलिए नक्षत्र, कुंडली आदि का प्रभाव तो उनके भी जीवन पर था. मनीष बताते हैं कि श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपदमास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्याह्ण के समय हुआ था. वह मथुरा नगरी के कारागार में जिस समय जन्मे तब वृषभ लग्न उदित हो रहा था. यही वह समय था जब खुद ईश्वर ने मानवी रूप में अवतार धारण किया. यह समय निशीथ काल था, जब चंद्रमा अपने उच्च स्थान वृषभ राशि में स्थित था, और गुरु, मंगल, शनि आदि अपनी विशिष्ट उच्च और स्वग्रही स्थिति में थे.

मंगल ग्रह से उज्ज्वल बना भाग्य, लेकिन परिस्थितियां रही विपरीत

भगवान कृष्ण के 12वें भाव के स्वामी यानी कारागार के कारक ग्रह मंगल भाग्य भाव में आकर बैठ गए, और तन भाव अथवा लग्नेश षष्ठ भाव में स्वग्रही होकर विराजमान थे . इसलिए श्री कृष्ण का भाग्य उज्जवल भी रहा और जन्म के साथ ही कष्ट की शुरुआत भी रही. इसी ग्रह स्थिति के कारण उनका जन्म शत्रु के घर, कारागार में और विपरीत परिस्थिति में हुआ था.

रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा ने मां की शांति और समाधान
लेकिन, जन्म पर गहरा प्रभाव नक्षत्र का भी पड़ता है. श्री कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. इस नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है और मन का कारक है. इसी के कारण चंद्रमा की शीतलता उनके मन और जीवन दोनों में बनी रही. श्री कृष्ण के मोहिनी मुस्कान की वजह भी यही नक्षत्र था. उनके सानिध्य में रहने वाले लोग भी उनसे इसी शीतलता के प्रसाद पाते थे .

केतु के कारण जीवन में संघर्ष और असंतुलन.

खैर जीवन है तो नियति का भी अस्तित्व है और यह ईश्वर से ऊपर ही दिखाई देती है. श्री कृष्ण की कुंडली में लग्न की स्थिति केतु भी आकर बैठ गए. इसने उनके भीतर के आंतरिक द्वंद्व को दिखाया. इसी वजह से श्री कृष्ण जन्म के तुरंत बाद से ही संघर्षों में उलझ गए. केतु छलावे का प्रतीक है. अगर यह नियंत्रित स्थिति में नहीं है तो जीवन भी अनियंत्रित और असंतुलित रहता है.

लेकिन इन्हीं ग्रहों की स्थिति ने बनाया विजयी और पराक्रमी भी

इस तथ्य पर और गहराई से बताते हुए आचार्य हिमांशु उपमन्यु ने भी एक सुंदर तर्क सामने रखते हैं. वह बताते हैं कि केतु भ्रम की स्थिति पैदा करती है. वह कुछ ऐसा है कि जैसे अभी है या अभी नहीं वाली स्थिति. इस दुविधा की तरह समझ लीजिए. लोक व्यवहार में और ज्योतिष में भी केतु की आकृति– आकार सांप की तरह है. पुराणों में वर्णित है कि श्री कृष्ण ने कालिया नाग का दमन किया था. कालिया नाग का दमन सिर्फ गोकुल को विष से मुक्ति दिलाने के लिए नहीं था. असल में श्री कृष्ण ने बाल्यावस्था में ही अपने जीवन में केतु के प्रभाव को नियंत्रित कर लिया था. एकांत में आखिरी समय का बीतना. यह केतु के कारण ही श्री कृष्ण को ” मायावी ” और छलिया जैसे नामों से सुशोभित किया गया. वह योगेश्वर और सिद्धेश्वर भी कहलाए .

उच्च शनि ने कराया शत्रुओं का विनाश

कुंडली में षष्ठ भाव यानी शत्रु भाव में उच्च के शनि ने ‘ शत्रु– हंता ‘ योग बनाया, जिसके कारण बाल्यकाल से ही पूतना, वकासुर आदि शत्रुओं को पराजित करने की कथाएं सामने आती है. बुद्ध और मंगल का उच्च में होना उन्हें कुशाग्र बुद्धि और पराक्रमी भी बनता है। उच्च गुरु ने उन्हें धर्मात्मा बनाया, तो उच्च शनि ने पुरुषार्थ के लिए आगे बढ़ाया, तो स्वग्रही शुक्र ने राधा का दिव्य प्रेम दिलवाया, लेकिन शनि ने विरह की वेदना भी दी.