विचार की तपिश

डॉ राम मनोहर लोहिया के वैचारिक दर्शन – पूर्व जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी

हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट

डॉ राम मनोहर लोहिया के वैचारिक दर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी ने विचारोंत्तेजक, गहन गंभीर, मीमांसा प्रस्तुत की है. संयुक्त विपक्ष इंडिया ब्लॉक के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी वैचारिक रूप से डॉ लोहिया के अनुयायी हैं. आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा आयोजित तृतीय डॉ राम मनोहर लोहिया समिति स्मृति व्याख्यान – माला 2017 में बी. सुदर्शन रेड्डी द्वारा दिया गया व्याख्यान. ( नोट : मूल व्याख्यान अंग्रेजी में है, इसका हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत है.)


नई दिल्ली/ ग्वालियर/ हैदराबाद, 22 अगस्त, 2025. डॉ राम मनोहर लोहिया की स्मृति में व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए बी सुदर्शन रेड्डी ने कहा कि इस कार्य को मैंने बहुत ही विनर्माता पूर्वक स्वीकार किया है. बीकानेर के महाराजा द्वारा लीग ऑफ़ नेशंस में प्रतिनिधित्व का जिस वक्त विरोध किया गया तब लोहिया केवल 20 वर्ष के थे. कांग्रेस के विदेश विभाग की उन्होंने की. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की बुनियाद रखी. जेल में अंग्रेजों की प्रताड़ना सही और आजाद भारत में सोशलिस्ट पार्टी की नींव रखने के साथ समाजवाद में मानवीय तत्व को उन्होंने प्रमुख स्थान पर रखा. एक ऐसा इंसान जो जीवनभर अविराम गति से अमीरी – गरीबों की खाई पाटने, जाति और लिंग के भेद को मिटाने, बड़ी मशीनों के तकनीक व सामाजिक दुष्परिणाम बताने में लग रहा, असंख्य नर – नारी मुट्ठी भर लोगों के हिंसा व दमन के चक्र में पीढ़ी दर पीढ़ी क्यों फंसे हैं, उनके कारणों के विषय में सचेत करता रहा, उसकी दृष्टि का वर्णन क्या आसान है ? जब भी मैं डॉक्टर लोहिया के बारे में सोचता हूं, उनसे जुड़ा एक किस्सा याद आता है जो आज के समय में प्रासंगिक लगता है. आजादी के बाद जब वे एक चुनाव में खड़े हुए तब एक खास समुदाय के लोगों ने एक उपासना स्थल के परिसर में उनसे चुनावी भाषण देने का आग्रह करते हुए कहा था कि अगर लोहिया ऐसा करते हैं तो उन्हें भारी संख्या में उस समुदाय के वोट मिलेंगे. लेकिन डॉक्टर लोहिया ने ऐसा करने से मना कर दिया और वे बहुत कम मतों से चुनाव हार भी गए. लोहिया मानते थे कि प्रार्थना स्थल जैसे पवित्र स्थल का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह स्थल केवल मनुष्य की आत्मिक उन्नति के लिए है. डॉ लोहिया ऊंचे नैतिक मूल्यों को धारण करने वाले एक सुसभ्य उच्च स्तरीय विद्वान एवं उदारवादी व्यक्ति थे. सामाजिक न्याय के दायरे में समाज के व्यापक हित के लक्ष्य के प्रति वे पूरी प्रखरता के साथ प्रतिबद्ध रहे . आज कई स्थानों पर कहीं मुखर तो कहीं दबे स्वर में अक्सर जब यह सुनने को मिलता है कि क्या भारत फासीवाद यानी तानाशाही की ओर बढ़ रहा है जहां लोकतांत्रिक मूल्यों को किनारे रख संवैधानिक व विधायी संस्थाओं को समझौते के लिए मजबूर किया जाएगा? संविधान के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों को मिलने वाली धमकियां और पत्रकारों की हत्या को देखकर बरबस लोहिया याद आते हैं, और यह गीत ‘ जिन्हें नाज़ है हिंद पर वह कहां हैं?’ लोहिया को केवल ओजस्वी और मर्मस्पर्शी भाषणों के लिए याद किया जाए यह तो मैं नहीं कहूंगा. इस अस्थिर समय में जब यह कहा जा रहा हो कि 60 सालों में कुछ नहीं हुआ, जब बिना सोचे समझे यह दावे किए जा रहे हों कि अब हम सब करने जा रहे हैं. परंतु उन सिद्धांतों को चिन्हित करने से पहले, तकनीक के अविवेकपूर्ण इस्तेमाल के प्रति डॉ लोहिया की उन तलस्पर्शी चिटा को समझना होगा जिनमें जनसाधारण के दास बनने, लोकतंत्र के ध्वस्त होने, समता एवं लोक कल्याण के मूल्यों की समाप्ति के खतरे नजर आते हैं. हाल में मैंने विवेक वाधवा और अलेक्स सालकेवर की लिखी किताब’ द ड्राइवर इन द ड्राइवरलेस कार : हाउ अवर टेक्नोलॉजिकल चायसेज विल
क्रिएट द फ्यूचर, अमर्त्य सेन ने जो कुछ कहा है लगभग वही उन्होंने कठोर शब्दों में कहा है. मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहूंगा कि डॉ लोहिया के जीवन और विचारों को यदि समझना है तो जिस एकांगी ( एक रूप ) मानसिकता या ‘ मोनोटोनिक माइंड के खिलाफ वे जीवन भर जूझते रहे उसे संघर्ष को समझना होगा. हालांकि, उन्होंने ( डॉ लोहिया ) इस शब्द का उपयोग बड़ी मशीनों के संदर्भ में किया है . ई. एफ. शुमाखर ने ‘ स्मॉल इज ब्यूटीफुल– बताते हुए उत्पादन में इंसान के श्रम का उपयोग करने वाली जिस वैकल्पिक तकनीक को अपने की जरूरत बताई है, डॉ लोहिया इस अर्थशास्त्र को राजनीति में लागू करना चाहते थे. यह एक सही सिद्धांत हो सकता था, भले कुछ हद तक अधूरा हो. आखिर डॉक्टर लोहिया वंचित समुदाय को समर्थ बनाने के प्रबल हिमायती होने के साथ-साथ इस बात के लिए लड़ते भी रहे. भारत की महिलाएं इंटरनेट की मदद से अपने पुरुष साथियों को अगर यह बता सकें कि दूध का सबसे अच्छा दाम कहां मिल रहा है, तो लोहिया इसका विरोध करते ऐसा शायद ही कोई कहे. नई पीढ़ी ज्ञान के समुद्र में ( इंटरनेट के जरिए ) गोते लगा रही हो और लोहिया इसका विरोध करते ऐसा भी नहीं. लेकिन राजनीति के कुछ ना समझ लोग लगातार डॉ लोहिया को विज्ञान एवं तकनीक के विरोधी के रूप में प्रचारित करते रहे. हमें लोहिया को समझने के लिए संदर्भ के साथ और गहराई से अध्ययन की जरूरत है. हम आज तक देश के बच्चों को ठीक-ठाक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में समर्थ नहीं हुए हैं. जस्टिस जीवन रेड्डी ने जिस तत्व को संविधान में दिए जीवन के अधिकार के साथ जोड़ा था उसे लागू करने में ही हमारे नीति निर्माताओं को 14 साल लग गए. प्रदेशों के बीच, शहर और गांवों के बीच,अगड़ी — पिछड़ी या जाति के ऊंच – नीच के बीच जब देश बंट गया तब कहीं एक दशक बाद 14 वर्ष तक की मुफ्त शिक्षा के अधिकार को लागू किया जा सका. हमारे नीति– निर्माता एक ओर देश के युवाओं को गरीबी से बाहर खींचने की बात कह रहे हैं, उसी समय पहले पायदान की नौकरियां बड़े पैमाने पर घट रही हैं . थॉमस पिकेटी ने बढ़ती गैरबराबरी की तीव्रता को दर्ज करते हुए कहा है कि पिछले 5 10 वर्षों में देशों के अंदर और तमाम दुनिया भर में वैश्वीकरण व नव उदारवादी नीतियों के चलते बेरहम ढंग से असमानता बढी है. पिछले 40 साल में आर्थिक सामाजिक दृष्टि से समृद्ध अभिजात्य वर्ग की संख्या में जिस तेजी से इजाफा हुआ है उसे देखते हुए नहीं लगता कि साधन ही व साधन संपन्न वर्ग के बीच की खाई आने वाले समय में इतनी आसानी से पटेगी. औपनिवेशिक शोषण के कारण औद्योगिक क्रांति का जो दूसरा दौर आया उस अवधि में देशों के बीच जो असमानताएं बढ़ी उस पर नजर दौड़ाई जाए. अध्येता व नीति निर्माता यह कह सकते हैं कि गैर बराबरी की यह खाई कुछ ही पीढियों में ज्यादा से ज्यादा एक शताब्दी के अंतराल में पट जाएगी. लेकिन निकट भविष्य में तो यह खाई कम होती नहीं दिखती. युवाल नोहा हरारी के मुताबिक, तेजी से बढ़ती डाटा या आंकड़ों पर आधारित दुनिया में अब बहुत सी चीजों के साथ शक्ति या सत्ता का अर्थ और स्वरूप बदलने के लिए मानव समुदाय ने खुद ढालने की तैयारी कर ली है. मृत्यु पर विजय पाने जैसे चमत्कारों का हम दम साध कर इंतजार कर रहे हैं. ये अलग बात है कि इसकी कीमत हमें बड़े पैमाने पर असमानता और एक नए वैश्विक अभिजात वर्ग के उदय के रूप में चुकानी पड़ सकती है . गार्जियन अखबार में टिम एडम इसे बड़ी खूबसूरती से बयां करते हैं. ” तकनीक में अति समृद्धि लोग जो डाटा संसार के प्रभु होंगे वे ही अति मानवीय क्षमताओं से लैस होकर सुदीर्घ आयु भी प्राप्त करेंगे. इस बीच मशीनों के चलते बेरोजगार हुआ मानव समुदाय का एक ‘ निरर्थक वर्ग’ पनपेगा जो ना व्यापार जगत के काम आएगा और न सैन्य कार्यों में. गणनाओं एवं आंकड़ों में इस कदर विश्वास दृढ होगा कि वे ही पवित्र मन लिए जाएंगे . आदर्श लोक की कल्पना में खोए रहने वालों के लिए यही नियंता शक्ति सर्वज्ञता सर्व व्याप्त होगी जिस किसी ईश्वर से अलग करके देखना संभव न होगा. पृथ्वी के निवासी इससे निरंतर जुड़े रहेंगे. दु : स्वप्न देखने वाले भी इससे अछूते ना होंगे. आने वाले समय के चरम समृद्ध लोगों का हमें अभी से कुछ – कुछ आभास होता है. क्या नहीं होता ? हमने अभिजात निर्णय– कर्ताओं की एक सतह बनाई है जो अनुपातहीन संपत्ति की दैत्याकार अर्थव्यवस्था के शिखर पर बैठकर दुनिया को अपने ढंग से चला रहे हैं, सारे निर्णयों को वे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. मैन्युअल कैसल नामक एक विद्वान ने सन 2000 में ऐसी अर्थव्यवस्था को ‘ नेटवर्क इकोनॉमी ‘ कहा था . कैसल ने आगाह किया था कि जैसे-जैसे आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी असमानता वृद्धि की गति तेज होगी. सरकार व नीति निर्धारकों के साथ जनता समाज मनोवैज्ञानिक रूप से बढ़ती दूरी को भी अनुभव करेगी. चुनाव प्रणाली की बाध्यता के चलते वे ( जनप्रतिनिधि) परिश्रामपूर्वक लोक कल्याण के कार्य करते हुए भी दिखेंगे परंतु संवैधानिक संस्थाएं कमजोर होती जाएगी, साथ ही खास उन्मादी धार्मिक समूहों का प्रभाव बढ़ेगा. पिछले कुछ वर्षों में इस किस्म का राजनीतिक विकास नजर आ रहा है जिसमें उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र कमजोर हुआ है. निरंतर हमें ऐसे निराशाजनक स्वर सुनाई देते हैं जिसमें विखंडित दुनिया, विखंडित राष्ट्र, विखंडित समाज की तस्वीर उभरती है. हम यहां कैसे पहुंचे? और इतनी तेजी से? क्या डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे प्रज्ञावान बौद्धिक की अंतर्दृष्टि को हमने अनदेखा किया है. ( शेष अगले अंक में. प्रस्तुति, प्रोफेसर राजकुमार जैन)