अखिलेश, ममता, उद्धव और… सबने कांग्रेस को फसाया ! कैसे बीच मझधार में अकेले पड़ गए राहुल गांधी ?
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट
पीएम — सीएम बिल पर जेपीसी में शामिल होने को लेकर इंडिया ब्लॉक में मतभेद हैं . ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया है.

नई दिल्ली/ मुंबई/ कोलकाता/ लखनऊ/ हैदराबाद, 26 अगस्त, 2025. सबको जोड़कर चलने की कोशिश में जुटी कांग्रेस एकबार फिर अकेली पड़ती जा रही है. पीएम — सीएम वाले बिल पर विपक्षी एकता का गुब्बारा फूटने लगा है. पीएम — सीएम को हटाने वाले बिल पर जेपीसी में शामिल होने को लेकर इंडिया ब्लॉक में दो फाड़ नजर आ रहा है. इंडिया गठबंधन के प्रमुख साथियों ने कांग्रेस को फंसा दिया है. जेपीसी मामले पर राहुल गांधी अब बीच मझधार में फंस चुके हैं. यहां से वह किसी ओर जाएंगे, यह आने वाले वक्त में पता चल जाएगा. दरअसल, भ्रष्टाचार यानी आपराधिक मामलों में कम से कम 30 दिनों तक बिना जमानत के जेल में रहने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हटाने वाले बिलों को जेपीसी के लिए भेजा गया है. इस बिल पर विचार करने के लिए बनने वाली जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होने को लेकर ही विपक्षी खेमे यानी इंडिया ब्लॉक में मतभेद है.
विपक्षी एकता में दरार ?
जब संसद में 130 वां संविधान संशोधन विधेयक पेश हुआ तब विपक्षी खेमा एकजुट नजर आया था. मगर अब धीरे-धीरे इस एकता की दीवार ढहने लगी है. पीएम — सीएम वाले बिल पर जेपीसी में हिस्सा लेने को लेकर इंडिया ब्लॉक के प्रमुख दलों में गहरी दरार उभर आई है. अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे से लेकर अरविंद केजरीवाल तक सबने कांग्रेस को फंसा दिया है. सपा, टीएमसी, आप और उद्धव गुट वाली शिवसेना ने जेपीसी से अलग रहने का फैसला किया है. हालांकि, कांग्रेस ने अब तक जेपीसी में शामिल होने के संकेत दिए हैं. इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के इस फैसले ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बीच मझधार में अकेला छोड़ दिया है. अब कांग्रेस के सामने यह मुसीबत है कि वह अकेले जेपीसी में जाएगी या फिर अन्य साथियों की तरह अलग रहने का ही फैसला लेगी ?
क्या है पीएम — सीएम बिल
दरअसल, बीते दिनों संविधान ( 130 वां ) संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ. यह बिल और इसके साथ जुड़े जम्मू कश्मीर पुनर्गठन संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश शान संशोधन विधेयक में प्रावधान है कि अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी ऐसे अपराध में गिरफ्तार या हिरासत में रहता है, जिसकी सजा 5 साल या उससे अधिक है, और यह हिरासत लगातार 30 दिन तक रहती है, तो वह अपने पद से खुद ब खुद बर्खास्त हो जाएंगे. हालांकि, जेल से आने के बाद वह पद ग्रहण कर सकते हैं. यह विधेयक 20 अगस्त को लोकसभा में पेश हुआ और इस दौरान विपक्षी सांसदों ने इसका जमकर विरोध किया. इसके बाद सरकार ने पीएम– सीएम वाले बिल को 31 सदस्यीय जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का फैसला किया . जेपीसी में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे. अभी तक इसका गठन नहीं हुआ है.
जानिए किसका क्या स्टैंड
ममता बनर्जी की टीएमसी ने भी जेपीसी से अलग होने का फैसला किया है . टीएमसी का कहना है कि यह बिल बीजेपी की ‘ राजनीतिक साजिश ‘ है, जो विपक्ष को फंसाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उलझाने का प्रयास है. जेपीसी में शामिल होकर टीएमसी भाजपा के खेल में नहीं पड़ेगी. अखिलेश की समाजवादी पार्टी का भी यही स्टैंड है. अखिलेश यादव ने इसे ‘ संघीय ढांचे पर हमला’ करार दिया. अखिलेश ने कहा कि यह बिल राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करेगा. हमारा फैसला स्वतंत्र है, और इस मामले में हम कांग्रेस के साथ नहीं चलेंगे. वहीं, उद्धव गुट वाली शिवसेना ने भी ममता और अखिलेश की राह अपनाई है. उद्धव ठाकरे ने कहा कि विपक्षी एकता चुनावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. लेकिन इस बिल पर जेपीसी में शामिल होने का मतलब बीजेपी की रणनीति को वैधता देना है. हम बाहर रहकर जनता के बीच मुद्दा उठाएंगे . वहीं, अरविंद केजरीवाल की आप सांसद संजय सिंह ने कहा, पार्टी जेपीसी में शामिल नहीं होगी, क्योंकि यह बिल भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. आरजेडी भी इससे अलग रहने का मन बना रही है.
फंस गई कांग्रेस ?
इस तरह इन चार दलों के फैसले ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया है. हालांकि, कांग्रेस ने अभी तक आधिकारिक फैसला नहीं लिया है, लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में हैं, ताकि बिल के कमजोर पक्ष को उजागर किया जा सके. हालांकि, अखिलेश, ममता, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल के बाद कांग्रेस पर दबाव बढ़ गया है. कांग्रेस असमंजस में है. वह क्या करें और क्या नहीं, अभी इस पर मंथन कर रही है. अगर कांग्रेस अकेले जाती है, तो यह इंडिया ब्लॉक की एकता को और कमजोर कर सकता है. साथ ही बीजेपी को विपक्ष की कमजोरी का फायदा मिल सकता है. यह स्थिति राहुल गांधी के लिए चुनौतीपूर्ण है और ऐसा लग रहा है कि वह मझधार में हैं. अब देखने वाली बात होगी कि इससे राहुल गांधी कैसे पार पाते हैं.