आसान नहीं होगी महागठबंधन में सीट बंटवारे की राह

बिहार महागठबंधन में सीटों के बंटवारे पर रार मची हुई है. कांग्रेस अपनी मजबूत सीटों पर दावा कर रही है जिससे राजद की बेचैनी बढ़ गई है. कांग्रेस चाहती है कि सीटों का बंटवारा बराबर का हो.वामदलों और अन्य दलों के लिए भी सीटें चाहिए. पिछली बार के प्रदर्शन को देखते हुए कांग्रेस इस बार बेहतर सीटें चाहती है जबकि राजद उसे, कम सीटें देने पर अड़ा हुआ है.

पटना/ हैदराबाद, 20 सितंबर 2025. कुटुंबा विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो बार चुनाव जीते राजेश राम ( कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष) की सीट पर राजद ने सुरेश पासवान को आगे कर दिया है, यह जानते हुए भी कि यह उसके हिस्से में आने से रही. महागठबंधन में सीटों के लिए मची रार का यह एकमात्र उदाहरण नहीं. आधी से अधिक सीटों पर यही खींचतान है और किसका महत्वपूर्ण कारण कांग्रेस द्वारा की जा चुकी मजबूत और कमजोर सीटों की पहचान है. अब तक यह पहचान एकमात्र राजद और माले की थी. समझौते की मेज पर कांग्रेस गच्चा खाती रही. अब उसने साफ कह दिया है कि ऐसा नहीं हो सकता कि सभी मजबूत सीटें एक दल को मिले और कमजोर दूसरों को.बंटवारा बराबर का होगा. अंदरखाने राजद की बेचैनी बढ़ी हुई है. कांग्रेस को पर्याप्त संख्या में पसंदीदा सीटें चाहिए. उसकी पसंद सहयोगी दलों, विशेष कर राजद की पसंद से टकरा रही है . इसलिए सीट बंटवारे की जो बात 15 सितंबर से शुरू होने वाली थी, वह अब नवरात्र तक के लिए टल गई है.

कांग्रेस ने की कमजोरी सीटों की पहचान

पिछली बार महागठबंधन में सबसे खराब प्रदर्शन कांग्रेस का रहा था. वह 45 कमजोर सीटें थी, जिन्हें कांग्रेस अब जाकर पहचान पाई है . राजद के लिए वह पिछली बार लड़ी गई उसकी 52 सीटों को कमजोर मानती है, जहां पराजय मिली. संख्या में कमजोर सीटें राजद के पास इसलिए अधिक है, क्योंकि पिछली बार कांग्रेस से दोगुने से अधिक सीटों पर उसके प्रत्याशी थे.

कांग्रेस को 50 सीट पर रोकेगी आरजेडी
राजद की उन कमजोर सीटों में एक दर्जन पर इस बार कांग्रेस दावा कर रही है. दावे का आधार उन सीटों का सामाजिक समीकरण और मजबूत अभ्यर्थियों की उपलब्धता है. उन सीटों का मोह आरजेडी को भी कम नहीं. पेच स्वाभाविक है. आरजेडी उसे 50 सीटों पर रोकना चाह रहा है. इसलिए बात नहीं बन रही है. पिछली बार राजद ने अपने हिस्से में ग्रामीण पृष्ठभूमि और मुस्लिम– यादव समीकरण वाली सीटें रखकर कांग्रेस को शहरी परिक्षेत्र की वैसी सीटें थमा दी थी, जिन पर एनडीए की स्थिति मजबूत थी.

सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग की सीटों पर कांग्रेस की हालत खराब

सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग की दमदार उपस्थिति वाली उन सीटों पर कांग्रेस निपट गई . उन कमजोर सीटों में लगभग डेढ़ दर्जन के बदले कांग्रेस उतनी ही संख्या में उन सीटों को मांग रही, जिनमें से 14 पर पिछली बार महागठबंधन पराजित हुआ था. उनमें से 12 सीटें आरजेडी खाते की है. जैसे मोहनिया में उसकी प्रत्याशी संगीता कुमारी विजयी रही थी. संगीता अब बीजेपी की हो चुकी है. अनुसूचित जाति की बहुलता के कारण वहां अपनी संभावना देख रही है, जबकि आरजेडी अपनी पिछली जीत के आधार पर अड़ा हुआ है . कांग्रेस की पसंदीदा बनियापुर में पेच भी कुछ ऐसा ही है, जहां पिछली बार आरजेडी विजयी रहा था और वीआईपी निकटतम प्रतिद्वंदी. वामदलों पर विशेष कृपा के साथ नए साथियों ( वीआईपी, रालोसपा, झामुमो ) के लिए लगभग 30 सीटें चाहिए. ऐसे में पसंद को वरीयता देते हुए इस बार 60 सीटें मिले तो कांग्रेस को कोई आपत्ति नहीं.

अच्छी — बुरी सीटें
आरजेडी: 92 सीटें मजबूत. 75 जीती और हारी हुई 17 सीटें. पिछली बार की शेष 52 सीटें कमजोर. कांग्रेस: 27 सीटें मजबूत. 19 सीटें जीती और हारी हुई 8. पिछली बार की 43 सीटें कमजोर. माले : 14 सीटें मजबूत. 12 जीती हुई और हारी 2 सीटें. पिछली बार की 7 सीटें कमजोर. भाकपा — माकपा :03–03 सीटें मजबूत. दोनों की 2–2 जीती हुई और 1–1 पर हारी हुई सीट.

पिछली बार की हिस्सेदारी
2020 में महागठबंधन में राजद 144, कांग्रेस 70, माले 19,भाकपा 6 और माकपा 4 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. तब वीआईपी एनडीए मे थी और उसके 11 में से 4 प्रत्याशी सफल रहे थे.