
पहले चरण में बंपर वोटिंग, पिछले चुनावों के पैटर्न से समझते हैं बिहार में किसे पहुंच सकता है फायदा
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की चुनावी रिपोर्ट
ज्यादा वोटिंग परिवर्तन का संकेत है, सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष प्रो इनकंबेंसी का वोट है या फिर ये जन सुराज की क्रांति का उदय है? पिछले कुछ विधानसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न से संकेत समझने की कोशिश करते हैं.
नई दिल्ली/ पटना/ हैदराबाद, 7 नवंबर, 2025. बिहार चुनाव के पहले चरण में बंपर वोटिंग हुई है. 121 सीटों पर 64.69 फ़ीसदी मतदान देखने को मिला है. इस बंपर वोटिंग के बाद से ही सियासी दलों के बीच हलचल तेज है. मीडिया के सामने जरूर दावें हो रहे हैं कि बढ़ी हुई वोटिंग उनके पक्ष में गई है, लेकिन असल में कोई नहीं जानता कि जनता का मूड क्या है. ज्यादा वोटिंग परिवर्तन का संकेत है. सतरूढ पार्टी के पक्ष प्रो इनकंबेंसी का वोट है या फिर जन सुराज की क्रांति का उदय है? पिछले कुछ विधानसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न से संकेत समझने की कोशिश करते हैं.
पहले चरण की 121 सीटों पर कितनी वोटिंग हुई ?
बिहार चुनाव की शुरुआत काफी जोरदार हुई है, तमाम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि इस बार सबसे ज्यादा मतदान हुआ है.
टॉप 10 सीटें जहां सबसे ज्यादा वोटिंग हुई
इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा वोटिंग मीनापुर में देखने को मिली है जहां पर मतदान प्रतिशत 77.62 फ़ीसदी रहा है . इसके अलावा ( बोचहां –91) में 76.35%, ( कुढ़नी –93) में 75.63%, ( सकरा –92) में 75.35%, और उजियारपुर– 134) में 73.99%, मतदान दर्ज किया गया. वहीं, कल्याणपुर– 131 ) में 73.62%, ( बरूराज –96) में 73.50%, ( सराय रंजन– 136) में 73.33%, ( पारु — 97) में 72.62%, और समस्तीपुर– 133 में 72.12% मतदान दर्ज किया गया. ये टॉप 10 सीटें हैं जहां पर इस बार पहले चरण में सबसे ज्यादा मतदान हुआ.
टॉप 10 सीटें जहां सबसे कम वोटिंग हुई
इसी तरह ( दरोंदा — 109) में 58.90%, ( छपरा — 118) में 58.61%, ( दानापुर–186 ) में 58.52%, ( एकमा — 113) में 58.35%, ( शाहपुर– 198) में 57.11%, ( जिरदेई –106) में 57.17%, ( दरौली–107) में 57.0%, ( बिहार शरीफ — 172) में 55.09%, ( दीघा– 181) में 41.40%, और कुम्हरार — 183) में 39.57%, मतदान हुआ है. ये वो 10 सीटें हैं जहां सबसे कम देखने को मिली. यहां भी सबसे खराब हाल कुम्हरार सीट का रहा जहां सिर्फ 39.57% वोटिंग दर्ज की गई.
ज्यादा और कम वोट प्रतिशत का क्या मतलब होता है ?
किसी भी चुनाव में ज्यादा या कम वोट प्रतिशत के कई मतलब निकाले जाते हैं. चुनावी नतीजे भी इतने अनिश्चित रहते हैं कि ज्यादा और कम वोट प्रतिशत के मायने बदल जाते हैं, लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि अगर बंपर वोटिंग देखने को मिले, इसे ‘ बदलाव की संभावना’ या फिर किसी एक पक्ष में’ लहर ‘ से जोड़कर देखा जाता है . इसी तरह अगर वोटिंग प्रतिशत कम रह जाए तो इसे ‘ जनता में उदासीनता ‘ और कुछ मौकों पर वर्तमान सरकार के प्रति ‘ संतोष’ से जोड़कर देखा जाता है.
पांच फ़ीसदी का खेल और पलट जाती है सत्ता
बिहार चुनाव में अभी सिर्फ पहले चरण की वोटिंग हुई है, लेकिन इस राज्य का एक ऐसा ट्रेंड भी है जो काफी कुछ बताता है. ऐसा कई बार हुआ है कि राज्य में जब वोटिंग प्रतिशत में पांच प्रतिशत से अधिक का इजाफा दिखता है तो सत्ता बदल जाती है. इसकी शुरुआत 1967 के विधानसभा चुनाव से हो गई थी जब 66.51% मतदान हुआ था. उसे पिछले चुनाव यानी 1962 में वही आंकड़ा 44.57 प्रतिशत था, यानी कि 1967 में सीधे-सीधे 22.04% का इजाफा हो गया . ये पहली बार था जब राज्य में गैर कांग्रेसी दलों ने मिलकर बिहार में संयुक्त सरकार बनाई. इसका एक और प्रमाण 1980 में देखने को मिला था जब कांग्रेस ने बिहार में वापसी की थी. असल में जब 1977 में विधानसभा चुनाव हुए थे, तब राज्य में वोटिंग प्रतिशत 50.5% रहा था, लेकिन 3 साल बाद ही वो आंकड़ा 57.3% तक चला गया, यानी कि फिर से 5% से ज्यादा इजाफा . इस इजाफे ने बिहार में सत्ता परिवर्तन किया. इसी तरह राज्य में जब पहली बार लालू प्रसाद की सरकार बनी, तब भी पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में वोटिंग ज्यादा हुई थी. चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 1985 में बिहार में वोटिंग प्रतिशत 56.3% थी, लेकिन 1990 में ये बढकर 62.0% पर पहुंच गई. यानी कि 5.8 फ़ीसदी ज्यादा वोटिंग ने बिहार में सत्ता बदली थी. वैसे 1990 के बाद 1995 में जब चुनाव हुए थे, वोटिंग में गिरावट दर्ज की गई, आंकड़ा 61.8 परसेंट रहा और लालू ने सत्ता में वापसी की. लेकिन इसके अगले चुनाव यानी कि 2000 में वोटिंग प्रतिशत 62.6 रही, यानी पिछले चुनाव की तुलना में सिर्फ 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ और राजद की सरकार बनी रही. वैसे 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव एक अपवाद है जब वोटिंग टर्न आउट में भारी गिरावट देखने को मिली थी और सत्ता परिवर्तन हो गया. उस चुनाव में 45.85% वोटिंग रही और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. एक अपवाद 2015 में भी देखने को मिला जब महागठबंधन ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई. उस चुनाव में पिछली बार की तुलना में वोटिंग तो अधिक हुई, लेकिन अंतर 4. 18% का रहा.
क्या बढ़ा हुआ वोट जन सुराज की क्रांति का संकेत है ?
बिहार के इस चुनाव में एक फैक्टर जन सुराज पार्टी भी है. कहने को तो प्रशांत किशोर की पार्टी पहली बार चुनावी मैदान में उत्तरी है, लेकिन युवाओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता ने दूसरे दलों की टेंशन जरूर बढ़ा दी है. खुद प्रशांत किशोर या तो सीधे अर्श पर पहुंचने की बात कर रहे हैं या फिर फर्श पर रहने का अनुमान लगा रहे हैं. राजनीतिक जानकार प्रशांत किशोर की तुलना दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से करते हैं. इसका कारण यह है कि दोनों ही नेताओं की पार्टी एक अलग विचारधारा के साथ आई है अब अगर बिहार में इस बार अप्रत्याशित वोटिंग होती है, अगर दूसरे चरण में भी रिकॉर्ड टूटते हैं, प्रशांत किशोर जरूर इसे अपने पक्ष में दिखने की कोशिश कर सकते हैं.