समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट
बंगाल में चुनाव हमेशा से हिंसा के लिए कुख्यात रहे हैं, जिसमें सैकड़ो लोग मारे गए हैं. बदली डेमोग्राफी, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और ध्रुवीकरण ने चुनावी माहौल को बिगाड़ कर रख दिया है.
कोलकाता, 18 मार्च 2026. पंचायत, नगर निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक, बंगाल में होने वाले प्रत्येक चुनाव खून– खराबे के लिए कुख्यात है. विभिन्न राजनीतिक दलों के सैकड़ो नेता– कार्यकर्ता इसकी बलि चढ़ चुके हैं. बीते कुछ वर्षों में प्रदेश की बदली डेमोग्राफी, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस एवं मुख्य विपक्षी भाजपा के बीच बड़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा व सियासी ध्रुवीकरण ने यहां के चुनावी माहौल को बिगाड़ कर रख दिया है. मालदा और मुर्शिदाबाद जिले तो इतने संवेदनशील है कि वहां के आम लोग चुनाव आते ही सिहर उठते हैं. हर बार करी सुरक्षा व्यवस्था करके भी चुनावी हिंसा पर काबू नहीं पाया जा सका है. इस बार विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले राज्य के विभिन्न जिलों में जिस तरह के बड़े परिमाण में हथियारों और बमों की बरामदगी हुई है, वह और चिंता पैदा कर रही है.
बंगाल में ‘ पॉलिटिकल लीगेसी ‘ बन चुकी है हिंसा
बंगाल में एक मशहूर कहावत है—‘ जोर जार, मुलुक तार.’ इसका अर्थ है –‘ जिसके पास ताकत, देश उसी का.’ बंगाल की राजनीति में यह अंतिम सत्य बन चुका है. सत्ता पर आसीन होने के बाद हर एक पार्टी इसीका अनुसरण करती आई है. कांग्रेस के जमाने से शुरू हुआ यह सिलसिला वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासन से लेकर तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों की सत्ता तक बदस्तूर जारी है. विश्लेशको का कहना है कि बंगाल में एक पार्टी का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना राजनीतिक हिंसा बढ़ने का प्रमुख कारण रहा है. सत्ता की अभ्यस्त हो जाने के बाद पार्टी इस पर काबिज रहने का कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती.
दूसरी ओर विरोधी दल भी पूरा जोर लगाते हैं. यही जबरदस्त टकराव को जन्म देती है, जो राजनीतिक हिंसा का रूप धारण करती है. बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौरा वैसे पूरे साल ही जारी रहता है, लेकिन चुनाव आते ही यह बेहद उग्र रूप धारण कर लेता है क्योंकि उस समय वर्चस्व की लड़ाई चरम पर पहुंच जाती है और सभी दलों के नेता– कार्यकर्ता इसे निर्णायक लड़ाई की तरह देखने लगते हैं .
बंगाल चुनाव सबसे बड़ा बदलाव : ममता ने 74 के टिकट काटे, एक ही बार में पूरी सूची जारी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तथा टीएमसी मुखिया
ममता बनर्जी ने मंगलवार को 291 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी . इस मौके पर ममता ने कहा,’ हम भाग भाग करके लिस्ट जारी नहीं करते, एक साथ सभी प्रत्याशी उतार दिए गए हैं.’ टीएमसी ने
3 पहाड़ी सीटें दार्जिलिंग, कालिमपोंग और कुर्सियांग सहयोगी दल ‘ भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा ‘ के लिए छोड़ी है . टीएमसी लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश में है.
इस बार सबसे बड़ी लड़ाई भवानीपुर में
ममता बनर्जी इस बार भवानीपुर से चुनाव लड़ेंगी. उनके सामने भाजपा नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को टिकट दिया गया है. हालांकि, ममता 2021 में शुभेंदु के सामने नंदीग्राम से लड़ी थी. लेकिन 1956 वोटो से हार गई थी . इसके बाद भवानीपुर से यूपी चुनाव जीता . भवानीपुर की लड़ाई इस बार काफी दिलचस्प इसलिए है क्योंकि 2021 उप चुनाव में ममता बनर्जी करीब 58 हजार वोट से जीती थी. टीएमसी का दावा है कि एसआईआर में भवानीपुर में 47 हजार नाम हटे हैं. जबकि भाजपा ने इसे पारदर्शिता की प्रतिक्रिया बताया है.