वो 5 वजहें जो पश्चिम बंगाल चुनाव को दूसरे चुनावी प्रदेशों से अलग बनाती हैं

समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट
इस महीने चार प्रदेशों असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और एक केंद्र शासित राज्य पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं
कोलकाता/ गुवाहाटी/ चेन्नई/ तिरुवनंतपुरम, 1 अप्रैल 2026. इनमें पश्चिम बंगाल छोड़कर बाकी सभी जगहों पर वोटिंग एक ही दिन में पूरा हो जाएगा, जबकि पश्चिम बंगाल में मतदान दो चरणों में होगा– 23 और 29 अप्रैल को. हालांकि, बीती कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में चुनाव 6 और 7, बल्कि कभी-कभी आठ चरणों में भी कराए गए हैं. उसके मुकाबले इस बार का चुनावी कार्यक्रम काफी छोटा है– पूरे 1 महीने तक चलने के बजाय सिर्फ एक हफ्ते में खत्म हो जाएगा. लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है कि पश्चिम बंगाल का चुनावी माहौल देश के बाकी हिस्सों से अलग दिखाई देता है. दरअसल, भले ही चुनाव कई प्रदेशों में हो रहे हों, लेकिन मीडिया सबसे पैनी नजर पश्चिम बंगाल पर ही लगाए हुए हैं. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी के बीच की टक्कर को अखबारों और टीवी चैनलों पर किसी भी दूसरे प्रदेश के मुकाबले कहीं अधिक कवरेज मिल रही है. इसकी एक बड़ी वजह पश्चिम बंगाल की अलग तरह की राजनीतिक और सामाजिक विशेषताएं हैं.
इसके अलावा, लगभग 50 वर्षों से राज्य में अधिकतर वही पार्टियां सत्ता में रही है, जिनमें मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंदी दिल्ली में सत्ता में रहे. नतीजतन, केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच टकराव पश्चिम बंगाल की राजनीति की बार-बार दिखाई देने वाली एक सच्चाई बन चुका है. मौजूदा विधानसभा चुनाव को ही यदि देखा जाए, तो कम से कम पांच ऐसे अहम वजह है जो इसे देश के दूसरे चुनावों से स्पष्ट तौर पर अलग बनाते हैं. यह रिपोर्ट उन वजहों की तहकीकात करती है और बताती है कि वे किस तरह की चुनावी तस्वीर को आकार दे रहे हैं. पश्चिम बंगाल में चुनार से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद जिस पैमाने पर राजनीतिक हिंसा देखने को मिलती है, उसकी तुलना देश के किसी और प्रदेश से नहीं की जा सकती. ग्रामीण इलाकों में ऐसा होना आम बात है कि हारने वाली पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को उनके घरों से भगा दिया जाता है और उन्हें महीनों तक दूसरी जगह रहना पड़ता है. प्रदेश में ऐसी दृश्य बिल्कुल भी दुर्लभ नहीं है. यहां तक कि जिन प्रदेशों की छवि कानून व्यवस्था को लेकर खराब रही है, वहां भी आमतौर पर ऐसी घटनाएं नहीं दिखती. आंकड़े बताते हैं कि चुनावों के दौरान राजनीतिक हमलों में सबसे अधिक जानें पश्चिम बंगाल में जाती है. पढ़े लिखे और सु संस्कृत बुद्धिजीवियों के शहर के रूप में कोलकाता की छवि से इतर, एक ग्रामीण पश्चिम बंगाल भी है जहां राजनीतिक हिंसा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है. 1940 के दशक में अविभाजित बंगाल के तेभागा आंदोलन से लेकर बाद की घटनाओं, जैसे मारीचझापी, नानूर, छोटू अंगरिया और बोगटुई हत्याकांड तक, इस पैटर्न की जडें इतिहास में गहराई तक फैली हुई है . चुनावों के समय ऐसी हिंसा आमतौर पर कई गुना बढ़ जाती है और इस बार इसके अलग होने की कोई विशेष वजह दिखाई नहीं देती.
एसआईआर ( विशेष इंटेंसिव रिवीजन ) को लेकर विवाद
भारत के चुनाव आयोग ने हाल ही में कई प्रदेशों में मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए ‘ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ‘ यानि एसआईआर की प्रक्रिया शुरू की है. यह प्रक्रिया बिहार, उत्तर प्रदेश और केरल जैसे प्रदेशों में पूरी हो चुकी है या अभी चल रही है. लेकिन पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर जिस स्तर का विवाद, विरोध, अदालतों में मुकदमे, प्रदर्शन और अव्यवस्था के आरोप देखने को मिले हैं, वह बेमिसाल है. यहां तक की सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि यहां दूसरे प्रदेशों में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई, वहीं अकेले पश्चिम बंगाल में ही इतने बड़े पैमाने पर दिक्कतें क्यों खड़ी हो गई, यह स्पष्ट नहीं है . इसका जवाब शायद राज्य की सीमा से जुड़े बदलते हालात और लंबे समय से चले आ रहे बड़े पैमाने के आबादी प्रवाह के इतिहास में छिपा है. 1947 में भारत विभाजन के बाद से ही लगातार शरणार्थियों के जत्थे पश्चिम बंगाल आते रहे हैं. समय के साथ-साथ अवैध प्रवास का मुद्दा भी एक बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया है. इसके अलावा, चूंकि कोलकाता ऐतिहासिक रूप से पूर्वी और उत्तर पूर्व भारत का सबसे बड़ा शहर रहा है, इसलिए रोजगार की तलाश में पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में लोग इसके आसपास औद्योगिक इलाकों में आए, बस गए और यही के होकर रह गए. यही वजह है कि ममता बनर्जी ने एसआईआर के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया है — उन्होंने खुद अदालतों का रुख किया, कथित ‘ पीड़ितों ‘के साथ बार-बार प्रदर्शन किए और इसे अपने चुनावी अभियान का एक प्रमुख मुद्दा बना दिया.
इस बीच, इस प्रक्रिया को ठीक से लागू करने में चुनाव आयोग की बार-बार नाकामी ने बंगाल के लोगों का गुस्सा और भड़का दिया है. नतीजतन, एसआईआर से जुड़ा यह विवाद पश्चिम बंगाल के चुनाव को केरल या तमिलनाडु जैसे प्रदेशों के चुनवों से बुनियादी तौर पर अलग बना दिया है.
ममता बनर्जी की निर्णायक भूमिका
भारत के क्षेत्रीय नेताओं में ममता बनर्जी को आमतौर पर बीजेपी की सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी माना जाता है.
कांग्रेस छोड़ दें तो उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय स्तर पर शायद सबसे अहम विपक्षी ताकत है. 34 वर्ष पुराने वाम मोर्चा शासन का अंत करने वाली 2011 की उनकी जीत को भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड माना जाता है. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या तृणमूल कांग्रेस का लगातार 15 वर्षों से चला आ रहा शासन इस बार यानी 2026 चुनाव में अंत होगा या फिर अपने पूर्वर्तियों की तरह उसे भी एक लंबी पारी खेलने को मिलेगी.