चुनौती का सामना नहीं कर पाए नीतीश ! साथी ने दिखाया आईना, बताया क्यों किया…
समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट
प्रसिद्ध समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने दावा किया कि नीतीश कुमार में कभी भी चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत नहीं रही और उन्होंने हमेशा समझौता का रास्ता चुना. शिवानंद ने बिहार में होने जा रहे सत्ता परिवर्तन को जनता के साथ धोखा और बीजेपी के आगे वैचारिक आत्मसमर्पण बताया.
पटना, 13 अप्रैल 2026. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के सदस्य के तौर पर शपथ ले ली है और जल्द ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे. इसके बाद एक नए मुख्यमंत्री का चयन होगा एवं एक नई सरकार बनेगी. नए सीएम के बीजेपी कोटे से होने की संभावना है. इसी बीच विशिष्ट समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं और उनके नेतृत्व व राजनीतिक शैली पर सवाल खड़े किए हैं.
सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक लंबे लेख में शिवानंद तिवारी ने दावा किया कि नीतीश कुमार कभी भी ऐसे नेता नहीं रहे जो डटकर खड़े हो सकें और किसी चुनौती का सीधे तौर पर सामना कर सकें, क्योंकि उनके व्यक्तित्व में’ रीढ ‘( मजबूती) की कमी है .
चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ
शिवानंद तिवारी ने कहा कि नीतीश कुमार के भीतर वह हिम्मत नहीं दिखती, जो किसी नेता को बड़े निर्णय लेने और कठिन परिस्थितियों में मजबूती से अकेले खड़े रहने की ताकत देती है. उन्होंने लिखा कि नीतीश हमेशा टकराव से बचते रहे और हर कठिन स्थिति में समझौते का रास्ता अपनाते रहे . शिवानंद तिवारी के मुताबिक, यह प्रवृत्ति ही उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी रही है.
वादों से भागने का इतिहास
शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार के शुरुआती शासनकाल के दो बड़े संकल्पों भूमि सुधार और समान शिक्षा व्यवस्था की याद दिलाई, उन्होंने कभी बिहार में सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद जगाई थी. तिवारी ने लिखा,’ ये दोनों संकल्प बड़े एजेंडे थे, लेकिन इन्हें पूरा करने के लिए जिस राजनीतिक दृढता और टकराव की तैयारी चाहिए थी, उसका नीतीश में अभाव दिखा . परिणाम यह हुआ कि दोनों ही मुद्दे फाइलों और समितियों में दबकर रह गए.’
आरएसएस — मुक्त भारत से लेकर बीजेपी को सत्ता सौंपने तक
नीतीश कुमार के वैचारिक रुख पर सवाल उठाते हुए शिवानंद तिवारी ने कहा कि एक समय ऐसा था जब उनके दृष्टिकोण में समाजवादी विचारधारा स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी. वे गांधी, लोहिया और जयप्रकाश नारायण की परंपराओं का हवाला दिया करते थे. एक समय में तो उन्होंने विधानसभा में ‘ आरएसएस — मुक्त भारत ‘ की बात कही थी और बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की पहल के तहत पूरे देश का दौरा किया था. फिर भी आज, वही व्यक्ति बिहार में सत्ता की बागडोर इस बीजेपी को सौंपने के लिए तैयार हैं. तिवारी ने इसे महज एक राजनीति के बदलाव नहीं, बल्कि नीतीश कुमार का वैचारिक आत्मसमर्पण बताया.
दोस्ती से विरोध तक
दरअसल, नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी ने एक जमाने में जनता पार्टी के दौर में साथ मिलकर राजनीति की थी और उनके बीच गहरी दोस्ती थी. शिवानंद तिवारी 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े थे और काफी लंबे समय तक समाजवादी राजनीति का एक अहम हिस्सा रहे . बाद में वे आरजेडी ( राष्ट्रीय जनता दल) में शामिल हो गए और कई सालों तक पार्टी के प्रवक्ता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद के तौर पर काम किया. शिवानंद तिवारी विधायक, मंत्री और राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं.