प्रस्तुतकर्ता – हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो प्रमुख देहाती विश्वनाथ और विख्यात कवि पुरुषोत्तम कड़ेल की रचना
होली रंगों का तथा हंसी — खुशी का त्यौहार है. यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध उत्सव है. रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से 2 दिन मनाया जाता है . पहले दिन होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं और दूसरे दिन, जिसे प्रमुखत: धूलंडी व धुरड्डी, धुरखेल धूलिवंदन इसके अन्य नाम है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर — गुलाल इत्यादि फेकते हैं, ढोल बजाकर होली के गीत गाए जाते हैं और घर-घर जाकर लोगों को रंग लगाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं. हम यहां प्रस्तुत करते हैं कुछ मोहक पंक्तियां और हैदराबाद के विशिष्ट कवि तथा सफल मंच संचालक, गीतकार पुरुषोत्तम कड़ेल की स्वरचित रचना और साथ में वरिष्ठ पत्रकार, कवि देहाती विश्वनाथ की कुछ पंक्तियां.
हैदराबाद,23 मार्च,2024.

” रंग लगाओ… होली है”

वरिष्ठ पत्रकार व कवि देहाती विश्वनाथ, हैदराबाद

” रंग लगाओ होली है”
रंग -भंग दोनों चढ़ता है,
बाबूजी को होली में.
उछल – कूद जमके करते हैं,
बाबूजी तब होली में.
फाग सुनाते ढोल बजाते,
बजता झांझ – मंजीरा.
रंग-बिरंगे सभी निराले,
लाल- हरा कुछ पीला.
शुभ होली की पहन के टोपी,
मैं भी नाचूं टोली में.
उछलकूद जमके करते हैं,
बाबूजी तब होली में .
