मायावती के पुराने तेवर में आते ही सियासी अटकलों का दौर शुरू

मायावती के पुराने तेवर में आते ही सियासी अटकलों का दौर शुरू, क्या अखिलेश के साथ 1993 का करिश्मा दोहरा सकती है?

लखनऊ/ हैदराबाद, 12 मार्च, 2025. उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में अभी लंबा समय है. लेकिन प्रदेश में सरकार बनाने को लेकर गुणा- गणित अभी से शुरू हो गया है. भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निकालने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं . उन्होंने अपने बीते कुछ बयानों में बीजेपी को आड़े हाथों लेकर इस बात का एहसास कर दिया है. मायावती के इन बदलते तेवरों से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर भी शुरू हो गया है. चर्चा है कि अखिलेश यादव और मायावती एक बार फिर साथ आ सकते हैं. अगर यह दोनों नेता साथ आते हैं तो साल 1993 में मिली सपा – बसपा गठबंधन की करिश्माई जीत को दोहरा सकते हैं.

केशव देव मौज के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू+ दरअसल, यूपी में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए सत्ताधारी बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे पर काम कर रही है. सीएम योगी ने बजट सत्र के दौरान इसकी एक बानगी भी पेश कर दी है . उधर, मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी अपने पीडीए के सहारे यूपी की सत्ता में
वापसी करना चाहती है. लेकिन इसी बीच महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्य ने बड़ा बयान दे दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी से अकेले ना तो समाजवादी पार्टी जीत पाएगी और न ही बहुजन समाज पार्टी जीत पाएगी. उन्होंने कहा कि ऐसे में बेहतर यही होगा कि सपा और बसपा दोनों मिलकर बीजेपी को सत्ता से हटाकर 2027 में सरकार बना लें. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.

2019 में एक साथ आ चुके हैं दोनों धुरविरोधी.+ एक दूसरे के राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले मायावती और अखिलेश यादव मोदी को सत्ता से हटाने के लिए 2019 लोकसभा चुनाव में एक साथ आ चुके हैं. इस चुनाव में मायावती 0 से 10 सीट पर पहुंच गई थी, लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव 2014 के आंकड़ों पर ही सीमित रह गए थे. हालांकि, 10 सीटों का फायदा होने के बाद भी मायावती ने सपा का वोट बसपा में ट्रांसफर ना होने का आरोप लगाते हुए अपने रास्ते अलग कर लिए थे. इसके बाद से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अक्सर बीजेपी की तुलना में सपा और कांग्रेस पर ज्यादा हमले बोलने लगी थी. इस पर सपा मुखिया व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समय-समय पर अपनी प्रतिक्रिया भी दी है . यही नहीं, सपा ने बसपा के टिकटों पर भी सवाल खड़े किए हैं.

1993 की जीत को दोहराने का है मौका

राजनीतिक जानकारों की मानें तो राजनीति में कोई किसी का स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. 1993 में गठबंधन की सरकार बनाने के बाद 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद मुलायम सिंह यादव और मायावती के रास्ते अलग हो गए थे लेकिन साल बाद सपा और बसपा साथ आ गए थे. साल 2019 के चुनाव में अखिलेश, मायावती और मुलायम सिंह यादव एक साथ एक मंच पर नजर आए थे. इसलिए यह कहना कि यह दोनों दल एक साथ नहीं आ सकते हैं, गलत होगा. चर्चा यह भी है कि मायावती के साथ गठबंधन करके अखिलेश यादव 1993 वाले करिश्मा को दोहराना चाहते हैं. दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था, उसके ठीक बाद साल 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने मिलकर सरकार बना ली थी. तब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा के संस्थापक कांसीराम ने मिलकर सरकार बनाई थी.