
नक्सलवाद पर नकेल! इस साल 113 नक्सली हुए ढ़ेर, नक्सलबाड़ी से सुलगी थी चिंगारी
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट
25 मई 1967को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव की एक घटना से नक्सलवाद की चिंगारी
भड़की थी. नक्सलवादी आंदोलन के बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह देश के एक बड़े इलाके में किसानों, भूमिहीन
मजदूरों और आदिवासियों की यह तकलीफ रही कि उनके संसाधनों पर दबंग काकब जा रहा है.
नई दिल्ली/ नक्सलबाड़ी / हैदराबाद, 22 मार्च, 2025. आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई हिंसक आंदोलन रहे जो हर सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़े होते रहे. लेकिन इनमें माओवादी आंदोलन जिसे नक्सलवादी आंदोलन भी कहा जाता है, उसके तहत हुई हिंसा अब तक की सबसे लंबी और सबसे घातक हुई है. गुरिल्ला युद्ध में माहिर हथियारबंद माओवादियों से निपटा हर सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन रहा, क्योंकि माओवादी किसी एक राज्य नहीं, बल्कि अपने चरम दौर में आंध्र प्रदेश के तिरुपति से लेकर नेपाल के पशुपति तक कम से कम 7
राज्यों के करीब 200 जिलों में पूरी तरह सक्रिय रहे . लेकिन इस चुनौती से निपटने की सरकार की तमाम कोशिशें
अब रंग ला रही है. सरकार का दावा है कि अब यह 38 जिलों तक ही सिमट गया है. नक्सलवादियों से निपटने के मुहिम के तहत गुरुवार को दो बड़ी मुठभेडों को अंजाम दिया गया.
‘ नक्सली मुक्त भारत अभियान’ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवादियों के खिलाफ जारी इस ऑपरेशन पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा,’ नक्सली मुक्त भारत अभियान’ की दिशा में हमारे जवानों ने एक बड़ी सफलता हासिल की है. छत्तीसगढ़ के बीजापुर और कांकेर में सुरक्षा बलों के 2 अलग-अलग ऑपरेशंस में 22 नक्सली मारे गए. गृह मंत्री ने लिखा कि मोदी सरकार नक्सलियों के खिलाफ सख्ती के साथ आगे बढ़ रही है और समर्पण से लेकर समावेशन की तमाम सुविधाओं के बावजूद जो नक्सली आत्मसमर्पण नहीं कर रहे, उनके खिलाफ जीरो
टॉलरेंस की नीति अपना रही है. अगले साल 31 मार्च से पहले देश नक्सलमुक्त होने वाला है. 2800 वर्ग किमी इलाके में फैला इंद्रावती नेशनल पार्क एक टाइगर रिजर्व है, इसके कुछ इलाकों में नक्सलवादियों ने
अपनी पैठ बनाई हुई है. इसी साल 16 जनवरी को दामोदर नाम का एक बड़ा नक्सली नेता मर गया था, जो सीपीआई – माओवादी के तेलंगाना कैडर का सेक्रेटरी था. नक्सलवादी दामोदर की मौत नक्सलियों के लिए बड़ा झटका था और वह हथियारबंद हमलों में काफी माहिर था. उसके सिर पर 25 लाख रुपए का इनाम था और महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्य प्रदेश तथा ओड़िशा की सरकारों को अलग-अलग मामलों में तलाश थी .
नक्सलबाड़ी गांव से सुलगी थी नक्सलवाद की चिंगारी
सरकार की कोशिश है कि आम नागरिकों के लिए शुरू किए गए सिविक एक्शन प्लान के तहत नक्सल ग्रस्त इलाकों में स्थानीय लोगों की दशा को सुधार आ जाए एवं युवाओं को नक्सलवादियों के प्रभाव से मुक्त कराया जाए. दरअसल, नक्सलवादी आंदोलन के बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह देश के एक बड़े इलाके में किसानों, भूमिहीन मजदूरों और आदिवासियों की यह तकलीफ रही कि उनके संसाधनों पर दबंगों का कब्जा रहा है. बात करें तो, नक्सलवादी या माओवादी आंदोलन ने भारत में वामपंथी आंदोलन में उभरे तमाम मतभेदों के बीच जन्म लिया. वैसे तो इसकी जडें 1946 से 1951 तक चले तेलंगाना किसान विद्रोह तक जाती है, लेकिन इसने सही मायनों में जड़ पकड़ी 1967 में. 25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव की एक घटना से नक्सलवाद की चिंगारी भड़क गई . सदियों से सताऐ जा रहे किसान, मजदूर पहले ही महाजनों और जमींदारों के अत्याचार से परेशान थे. ऐसे में एक भूमि मालिक ने जब एक किसान को बुरी तरह पीटा और उसका सारा सामान लूट लिया, तो किसानों का गुस्सा भड़क उठा. लाठियों से लैस किसानों, भूमिहीन मजदूरों ने उस जमींदार और कई अन्य भूपतियों पर हमला बोल दिया. इसके साथ ही किसानों, भूमिहीनों और आदिवासियों के हकों की मांग को लेकर इस आंदोलन ने तेजी पकड़ ली .
और नक्सलवाद की चिंगारी बन गई ज्वाला
नक्सलबाड़ी गांव से इस आंदोलन को नक्सलवाद नाम मिल गया, जिसे बाद में माओवाद के नाम से भी जाना
गया. नक्सलवादी आंदोलन के अगुवा थे, चारु मजूमदार और उनके करीबी साथी कन्नू सान्याल और जंगल संथाल. हालांकि, नक्सलबाड़ी विद्रोह को पश्चिम बंगाल की तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट सरकार ने कुचल दिया, जिसे वामपंथी पार्टी सीपीएम कभी समर्थन हासिल था. बावजूद इसके इस आंदोलन जल्द ही एक बड़े इलाके में काफी समर्थन जुटा लिया . यही नहीं बड़ी चिंता की बात यह भी रही कि पड़ोसी देश चीन का भी इस विद्रोह को समर्थन मिल गया. तब चीन के मुख्य पत्र पीपल्स डेली ने इस विद्रोह पर अपना एक संपादकीय पेज नक्सलबाड़ी की घटना की अहमियत बताने में लगा दिया था. इसके बाद चारु मजूमदार और कन्नू सान्याल ने कम्युनिस्ट चीन के संस्थापक माओ त्से तुंग से प्रेरणा लेकर राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए उनकी रणनीति को अपनाने पर काम किया. लेकिन यहां आंदोलन हिंसक होता चला गया और 16 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत में मौत हो गई. बावजूद इसके आंदोलन जारी रहा.