अंबेडकर जयंती पर विशेष
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट

बरसात के दिनों में कीचड़ और पानी में बैठकर पढना भीमराव अंबेडकर की नियति बन चुका था.
जातिगत भेदभाव इतना गहरा था कि स्कूल में उच्च जाति के छात्र या शिक्षक उन्हें किताबें हाथ
मुंबई/ हैदराबाद, 14 अप्रैल, 2025. आज 14 अप्रैल है, भारत के संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती. उनके जीवन के कई पहलू प्रेरणा से भरे हुए हैं , लेकिन एक वाक्या ऐसा है, जो न केवल उनकी पीड़ा को
उजागर करता है, बल्कि उनके असाधारण आत्मबल और ज्ञान की लालसा को भी दिखता है. बचपन में जब डॉक्टर अंबेडकर स्कूल जाते थे, तो उन्हें कक्षा में बैठने के लिए चटाई तक नहीं दी जाती थी. बरसात के दिनों में
कीचड़ और पानी में बैठकर पढ़ना उनकी नियति बन चुका था. जातिगत भेदभाव इतना गहरा था कि स्कूल में उच्च जाति के छात्र या शिक्षक उन्हें किताबें हाथ से नहीं देते थे. किताब देने के लिए लकड़ी की छड़ी का इस्तेमाल होता था- ताकि उनका ” स्पर्श ” ना हो. यह वाक्या डॉ अंबेडकर ने अपनी आत्मकथा ” वेटिंग फॉर ए वीजा ” में लिखा है, यह दर्शाता है कि कैसे बचपन में उन्होंने छुआछूत जाति भेदभाव झेला.
किताब छूने की इजाजत नहीं
जिस बच्चे को कभी किताब तक छूने की इजाजत नहीं थी, उसी ने आगे चलकर एशिया की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी खड़ी कर दी. मुंबई स्थित अपने निवास’ राज गृह ‘ में उनके पास करीब 50 हजार किताबों का कलेक्शन था. यह किताबें उन्होंने दुनिया भर से मंगवाई थी, जो अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र,धर्म, कानून से लेकर साहित्य तक हर विषय पर थी.
8 साल की पढ़ाई 2 साल में पूरी
एक बार उन्होंने कहा था, ” मेरी असली दौलत यह किताबें हैं.” उनकी – पिपसा का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ते वक्त उन्होंने 8 साल का सिलेबस सिर्फ 2 साल में पूरा कर लिया था .
जब खुद तांगा चलाकर पहुंचे अंबेडकर
यह घटना उस समय की है, जब डॉ आंबेडकर किसी काम से शहर गए थे. स्टेशन से उतरने के बाद उन्हें जाने के लिए तांगा लेना था. लेकिन जैसे ही तांगे वालों को यह पता चला कि वह एक ” अछूत” माने जाने वाले समुदाय से हैं, सभी तांगे वाले मुकर गए. डॉ अंबेडकर ने उनसे विनती की, पैसे ज्यादा देने की बात भी कहीं, लेकिन जाति के नाम पर कोई तांगा उन्हें ले जाने को तैयार नहीं हुआ. आखिरकार, उन्होंने खुद ही तांगा हांकना शुरू कर दिया और अपने गंतव्य तक पहुंचे. ऐसे कर्म योगी को लोहिया विचार मंच, हैदराबाद के अध्यक्ष तथा सेवानिवृत्ति न्यायाधीश ठाकुर गोपाल सिंह और वरिष्ठ पत्रकार तथा समाजवादी विचारक देहाती विश्वनाथ ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके विचार को प्रासंगिक बताया.