जगन्नाथ प्रभु के रथ का पहिया टूटा, मंदिर में नहीं मिला प्रवेश ! कैसे पूरी हो पाएगी रथयत्रा ?

हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट
नीलाद्री बिजे रथ यात्रा का अंतिम अनुष्ठान है, जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को होता है. यह भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान सुदर्शन के मंदिर में वापसी का उत्सव है. एक-एक करके, देवताओं को उनके संबंधित रथों से जय- विजय द्वार के जरिए मुख्य मंदिर में औपचारिक जुलूस के साथ ले जाया जाता है.
पुरी / हैदराबाद, 7 जुलाई, 2025 . अभी तो बड़े धूमधाम से रथ यात्रा निकली थी. जगन्नाथ प्रभु अपने भाई – बहन के साथ गुंडिचा तीर्थ के लिए गए थे, लेकिन अचानक क्या हुआ ? जगन्नाथ महाप्रभु के रथ का पहिया कैसे टूट गया ? किसने तोड़ दिया और क्यों? इन सारे प्रश्नों के उत्तर में एक बहुत खूबसूरत पारिवारिक तना- बाना कसा हुआ है. ओड़िशा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक भी है. इस यात्रा में जहां भगवान का भक्तों से जुड़ाव झलकता है तो वहीं इस यात्रा के दौरान अपनाई जाने वाली परंपरा खुद भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक परंपराएं होती है, जिनकी झलक आमतौर पर हमारे और आपके घरों में भी दिख जाती है.
रथ यात्रा का आखिरी दिन होता है नीलाद्री बिजे
महाप्रभु की रथ यात्रा का आखिरी दिन होता है नीलाद्री बिजे. जिसका अर्थ है, जगन्नाथ यानी नीलमणि प्रभु की विजय. खास बात यह है कि यह विजय किसी शत्रु, असुर, दैत्य पर नहीं पाई जाती है, बल्कि यह विजय है हृदय पर. किसी के मन पर. किसके? खुद जगन्नाथ प्रभु द्वारा अपनी पत्नी लक्ष्मी के हृदय पर. असल में नीलाद्री बिजे रथ यात्रा का अंतिम अनुष्ठान है, जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को होता है. यह भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान सुदर्शन के मंदिर में वापसी का समारोह है. एक-एक करके, देवताओं को उनके संबंधित रथों से जय विजय द्वार के जरिए मुख्य मंदिर में औपचारिक जुलूस के साथ ले जाया जाता है. जब एक देवता रत्न सिंहासन पर स्थापित हो जाते हैं, तब अगले देवता के लिए जुलूस शुरू होता है. इसे ” गोटी पहांडी ” के नाम से जाना जाता है. यह हर साल होने वाला एक पारंपरिक अनुष्ठान है और लोक कलाकार बाकायदा नृत्य करते हुए इसका मंचन करते हैं. नीलाद्री बिजे की पटकथा 5 दिन पहले, यानी हेरा पंचमी को लिख दी जाती है. इसे समझने के लिए पहले पुरी में प्रचलित इस लोक कथा को समझना होगा.
क्यों नाराज हो गई देवी लक्ष्मी ?
हुआ यूं कि भगवान जगन्नाथ तो रथ यात्रा निकालकर देवी गुंडिचा के मंदिर चले गए, लेकिन देवी लक्ष्मी को ना तो कुछ बताया था और न ही यह कहा कि वे कब लौटेंगे. इससे देवी लक्ष्मी ने एक दिन इंतजार किया, दूसरे दिन किया, तीसरे दिन भी मन मसोसकर रह गई, चौथे दिन तो गुस्से में भर गई और पांचवें दिन इतनी क्रोधित हो गई कि पूछो मत. उन्होंने श्री मंदिर का दरवाजा खोला और गुस्से में ही निकल गई. महाप्रभु को खोजने. घबराए सेवक पीछे-पीछे दौड़े और किसी तरह आग्रह करके पालिका में बिठाया अगले चले देवी गुंडिचा के धाम. अगले दिन भक्त विश्व प्रसिद्ध ‘ महाप्रसाद ‘ जिसे नीलाचल अभदा ‘ के नाम से जाना जाता है, का स्वाद ले सकते हैं और जगन्नाथ महाप्रभु के नियमित दर्शन भी शुरू हो जाते हैं.
