हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट
नीतीश कुमार 1999 के बाद से कम से कम 6 बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन( एनडीए) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए ) के बीच बारी-बारी से सत्ता में आए हैं, जिससे उन्हें बिहार की राजनीति का ‘ पलटू कुमार’ तक कहा जाने लगा.
पटना/ हैदराबाद, 18 जुलाई, 2025. नीतीश कुमार का जातीय सर्वे मास्टर स्ट्रोक क्यों ? आखिर दो दशक से जदयू के प्रमुख बिहार की राजनीति के केंद्र में कैसे बने हुए हैं. नीतीश कुमार दो दशक से ज्यादा वक्त से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. इस दौरान उन्होंने राजनीतिक गंभीरता, खंडित जनादेश और कट्टर प्रतिद्वंद्वियों को दरकिनार किया है. पिछले 20 सालों से नीतीश कुमार बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं. यह सब इस तथ्य के बावजूद कि उनकी पार्टी जनता दल( यू ) को राज्य विधानसभा में कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. नीतीश कुमार 1999 के बाद से कम से कम 6 बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए ) के बीच बारी-बारी से सत्ता में आए हैं, जिससे उन्हें बिहार की राजनीति का’ पलटू कुमार’ तक कहा जाने लगा. नीतीश 2015 में यूपीए में शामिल होने से पहले 1999 से 2013 तक बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ थे. 2017 में, वह एनडीए में लौट आए. 2022 में फिर से यूपीए के साथ गठबंधन किया. 1 साल बाद, वह इंडिया ब्लॉक में शामिल हो गए, लेकिन 2024 में वो एक बार फिर एनडीए में शामिल हो गए.
नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं, जिसकी आबादी बिहार में केवल 3 फ़ीसदी है.
विडंबना यह है कि इन राजनीतिक दांव — पेंचों के बावजूद, बिहार की हर बड़ी राजनीतिक ताकत नीतीश कुमार के पक्ष में है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नीतीश कुमार को अपरिहार्य क्या बनाता है? जबकि नीतीश कुमार कुर्मी जाति से हैं, जो बिहार की आबादी का केवल 3 प्रतिशत है. अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में नीतीश को ‘ लव –कुश ‘( कुर्मी — कुशवाहा) का भरपूर समर्थन मिला और वे उनके निर्विवाद नेता माने गए. नीतीश ने विकास के एजेंड़े पर भी ध्यान केंद्रित किया और शराबबंदी जैसी अपनी कई महिला– समर्थक नीतियों से लोकप्रियता हासिल की. लेकिन समय के साथ नीतीश को एहसास हुआ कि आरजेडी या बीजेपी पर बढ़त हासिल करने के लिए उन्हें अपना जनाधार बढ़ाना होगा. इसलिए, जदयू प्रमुख ने कर्पूरी ठाकुर के आदर्शों पर अपनी राजनीति को ढालकर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर विशेष ध्यान केंद्रित करके पूरे अति पिछड़े समुदाय के इर्द — गिर्द अपना जनाधार बनाने की कोशिश की . नीतीश ने धीरे-धीरे खुद को अत्यंत पिछड़ा वर्ग के ‘ पोस्टर बॉय ‘ के रूप में स्थापित कर लिया, जो बिहार की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है.
नीतीश ने 2023 में जातिगत सर्वे की घोषणा करके खुद को राजनीति में जीवंत कर लिया
2023 में जातिगत सर्वे की घोषणा करके नीतीश ने अपनी राजनीति को फिर से जीवंत कर दिया और अपनी ‘ सामाजिक न्याय ‘ की साख का दावा किया. सर्वे के जरिए, नीतीश कुमार ने औपचारिक रूप से अपने वोट बैंक का भी ऐलान कर दिया, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि उन्हें या उनकी पार्टी को हाशिये पर नहीं धकेला जा सकता. राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि जातिगत सर्वे नीतीश कुमार को बिहार की सबसे बड़ी आबादी के नेता के रूप में पेश करने के लिए किया गया था. जातिगत सर्वे का उद्देश्य नीतीश कुमार बिहार की आबादी के सबसे बड़े हिस्से के नेता के रूप में पेश करना था, न कि केवल ‘ लव — कुश ‘ नेता के रूप में. यह अभ्यास राजद के लिए एक अनुस्मारक भी था कि नीतीश के पास व्यापक मतदाता आधार है, लगभग 36 प्रतिशत. जबकि लालू प्रसाद यादव का एमवाई ( मुस्लिम — यादव) समर्थन आधार लगभग 32% है. उन्होंने कहा कि 122 जातियों में मतदाता आधार बनाना आसान काम नहीं है. नीतीश ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इन समुदायों को लक्ष्य करके कई योजनाएं और कार्यक्रम शुरू किए हैं. इसके अलावा, जानकार बताते हैं कि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ईबीएस समुदाय के मुस्लिम मतदाता आगामी चुनावों में कैसे मतदान करेंगे. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार एनडीए के एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनकी मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी कुछ पकड़ है. हालांकि, हाल ही में नए वक्फ कानूनों के पारित होने के बाद यह देखना बाकी है कि यह घटनाक्रम मुस्लिम समुदाय के बीच उनके समर्थन को कैसे प्रभावित करता है. जातिगत सर्वे से जान पड़ता है कि राज्य में अति पिछड़ी जातियों में 122 जातियां शामिल हैं. अगर 10% मुस्लिम अति पिछड़ी जातियों को छोड़ दिया जाए, तो 26 प्रतिशत नीतीश के प्रबल समर्थक माने जाते हैं.