पटना जंक्शन पर तड़पती रही गर्भवती मां

महिला प्रेगनेंसी किस हालत में थी. दर्द की चीख ट्रेन के डिब्बे में गूंज रही थी, मगर पटना जंक्शन की ‘ वर्ल्ड क्लास’ तैयारियों में इंसानियत कहीं बाढ़ के पानी में बह गई थी.

पटना/ हैदराबाद, 3 जुलाई, 2025. बारिश के कहर से पटना की तस्वीर यूं तो बदली – बदली सी नजर आ रही है, मगर जेहन में जो तस्वीर सबसे ज्यादा चुभी, वो थी एक बेसहारा महिला की, जो एक कोच की सीट पर दर्द से तड़पती रही. नाम था पूनम देवी. दर्द की चीखें ट्रेन के डिब्बे में गूंज रही थी, मगर पटना जंक्शन की ‘ वर्ल्ड क्लास’ तैयारियों में इंसानियत कहीं बाढ़ के पानी में बह गई थी. पूनम देवी गया जिले के गुंडारू शंकर बीघा से इलाज के लिए पटना डॉक्टर के पास आ रही थी, रांची जनशताब्दी ट्रेन से यात्रा कर रही थी, मगर दर्द ने ऐसा घेरा कि बच्चा ट्रेन में ही हो गया. आधा बच्चा मां के पेट से बाहर था और आधा अंदर. परिजन बदहवासी में पुलिस, रेलवे प्रशासन, यात्रियों, महिला पुलिस हर किसी से मदद की गुहार लगाते रहे, मगर नजारा ऐसा था जैसे सबने मानो कानों में रुई डाल रखी हो. रेलवे स्टेशन, जिस एयरपोर्ट की तरह विकसित करने की बातें की जा रही है, वहां प्राथमिक मेडिकल सुविधा भी समय पर ना मिल सके, ये कि विकास की तस्वीर है? जीआरपी इंस्पेक्टर को कॉल किया गया, रेलवे हेल्पलाइन पर संपर्क किया गया, महिला पुलिस को सूचित किया गया पर नतीजा? ” अस्पताल को कॉल कर दिया गया है, ” डॉक्टर रास्ते में हैं, ” थोड़ा इंतजार कीजिए” और इसी इंतजार में एक मां सीट पर तड़पती रही. पुलिस मैडम तो कोच के अंदर जाने की जहमत तक नहीं उठाई. वो महिला सीट पर बैठी थी, दर्द से करती हुई. परिजन थे, मददगार बने, बच्चा आ चुका था, लेकिन ना कोई स्ट्रेचर, न नर्स, न डॉक्टर. केवल सवाल, केवल अनसुनी फरियादें और केवल सरकारी टालमटोल. पटना की बारिश ने वैसे तो हर रास्ते को बंद कर दिया है, सड़कों से लेकर रेलवे प्लेटफार्म तक जलजमाव ने हाल बेहाल कर रखा है. मगर पूनम देवी की कहानी बताती है कि पटना स्टेशन के कर्मचारियों और पुलिस की इंसानियत की भी बाढ़ में डूब कर मौत हो चुकी है. रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के लिए कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं ? शौचालय से लेकर वेटिंग रूम तक में गंदगी, मेडिकल हेल्प तक समय पर नहीं, पुलिस प्रशासन से जवाबदेही तक गायब. क्या यही है’ वर्ल्ड क्लास स्टेशन’ का ख्वाब? क्या ये वही पटना है, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर एयरपोर्ट जैसे जंक्शन के नाम पर वायरल हो रही है ? क्या यही वो विकास है, जिसमें एक मां को दर्द में तड़पते हुए अपनी असहायता से जूझना पड़ता है? रेलवे मंत्री जी, आपकी चमचमाती घोषणाओं के बीच ये एक मां की कराहती हुई पुकार है, जिसे आपने शायद सुना ही नहीं, सुन लीजिए, वरना अगली बार पटना जंक्शन नहीं, ‘ पत्थर’ जंक्शन कहा जाएगा, जहां दिल नहीं धड़कते, केवल सिस्टम की बेरुखी धड़कती है. सवाल वही है कि अगर वर्ल्ड क्लास बनाने में इतनी ही फुर्ती है, तो इंसानियत को बुनियादी सुविधा देना क्या इतना मुश्किल है ?