
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट
जब आबादी बढ़ रही है, तो बिहार में मतदाता क्यों घट रहे हैं – रहस्य, खेल या साजिश ? मतदाता सूची कहीं मौत — गायब रजिस्टर तो नहीं बन गई, जहां लोकतंत्र की गिनती आयोग के हाथों में कैद हैं? क्या हमारा मताधिकार अब आंकड़ों की बाजीगरी में गिरवी रख दिया गया है ?
नई दिल्ली/ पटना/ हैदराबाद, 17 अगस्त, 2025. पिछले सप्ताह के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण एसआइआर को चुनौती देने वाली याचिका पर चुनाव आयोग को दो महत्वपूर्ण निर्देश दिए — हटाए गए नाम की कारण सहित सूचित प्रकाशित करें और दावों के लिए आधार स्वीकार करें.
सुनवाई जारी रहेगी.
असामान्य आंकड़े
हालांकि, एसआइआर के कुछ पहलू ऐसे भी हैं, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है. एसआइआर की कुछ विशेषताएं अभूतपूर्व और चिंताजनक हैं. पहला, नाम : पहले पुनरीक्षण को विशेष या संक्षिप्त पुनरीक्षण कहा जाता था. दूसरा, समय: इससे पहले कभी भी लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनाव के चार महीने के भीतर ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया था. तीसरा, समय- सारिणी : ‘ पुनरीक्षण ‘ केवल 30 दिनों में किया गया तथा’ आपत्तियों और दावों का निपटारा अगले 30 दिनों में किया जाएगा . चौथा, दायरा : पिछले पुनरीक्षणों में पहले की मतदाता सूचियों को आधार डेटा के रूप में रखा गया था और नाम हटाए और जोड़े गए थे. इसके विपरीत एसआइआर ने वर्ष 2024 की मतदाता सूचियों को रद्द कर दिया और बिहार के लिए नई मतदाता सूचियां बनाने का दावा किया ( स्रोत: पूर्व चुनाव आयुक्त, अशोक लवासा). पांचवां, नाम हटाने पर अजीबो गरीब तरीके से जोड़ देना और नाम जोड़ने पर जानबूझकर चुप्पी साधना. अंत में, इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाता मसविदा सूची से बाहर रह गए : चुनाव आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि 7.89 करोड़ लोगों में से 22 लाख व्यक्तियों की ‘ मौत’ हो चुकी थी, 7 लाख व्यक्ति ‘ कई स्थानों पर पंजीकृत थे’ और 36 लाख व्यक्ति’ स्थाई रूप से स्थानांतरित हो गए थे या उनका पता नहीं चल पा रहा था’.
कोई नहीं जानता
मृत्यु और जन्म स्वाभाविक है. जब यह सही है कि मृत व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने चाहिए, तो क्या यह भी सही नहीं है कि किसी निश्चित तिथि को 18 वर्ष की आयु वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए ? बिहार की जन्म दर के मद्देनजर, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की संख्या निश्चित रूप से कुछ लाख में होगी. क्या उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया गया है? चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया, और किसी को पता नहीं. चुनाव आयोग ने कैसे निष्कर्ष निकाला कि 36 लाख लोग ‘ अस्थाई रूप से स्थानांतरित’ हो गए हैं या उनका ‘ पता नहीं चल रहा’? क्या चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर सर्वेक्षण किया ? क्या संबंधित लोगों ने स्वीकार किया कि वे बिहार से बाहर किसी अन्य जगह स्थाई रूप से चले गए हैं ? क्या चुनाव आयोग ने 36 लाख लोगों के ठिकानों की जांच कराई? चुनाव आयोग ने न्यायिक रूप से व्याख्या किए गए’ सामान्य निवासी ‘ के मानदंड को कब और क्यों त्याग दिया और उसके स्थान पर’ अस्थाई रूप से स्थानांतरित जैसे बहुअर्थी मानदंड को लागू कर दिया? यह कोई नहीं जानता.
एसआइआर में विश्वसनीयता, पारदर्शिता, प्रमाणिक साक्षयों और तर्कपूर्ण निष्कर्षों का अभाव है. ऐसा लगता है कि एसआइआर की शुरुआत पूर्व धारणाओं के आधार पर की गई है और उन्हीं धारणाओं को सही ठहराने के लिए यह कवायद की गई है. जिस देश की जनसंख्या सालाना 0.89 फ़ीसद की दर से बढ़ रही है, वहां मतदाता सूची में
किसी भी पुनरीक्षण के परिणाम स्वरूप मतदाताओं की संख्या में वृद्धि होगी ही, लेकिन बिहार में एसआइआर का विपरीत प्रभाव देखा जा रहा है.