दक्षिण भारत के प्रख्यात हिंदी प्रचारक व प्रसारक पंडित गंगाराम वानप्रस्थी एक याद

हैदराबाद, 17 सितंबर 2025. स्वतंत्रता सेनानी पंडित गंगाराम जी वानप्रस्थी, दक्षिण भारत के निजाम शासित हैदराबाद रियासत में बसंत पंचमी का पावन पर्व 8 फरवरी 2016 के दिन चंद्रिकापुर, हुसैनी अलम में एक साधारण मराठी परिवार में जन्मे. अल्प आयु में इनके पूज्य पिताश्री अनंतराम प्लेग महामारी के चपेट में आने से चल बसे. आपने अपनी दादी को भी खो दिया एवं एक बड़ी बहन भी इस महामारी में चल बसी . सन 1919 की विनाश लीला महामारी के समय गंगा राम जी केवल 3 वर्ष के ही थे और इनकी पूज्य माता बाड़ू बाई ने इस अनाथ पुत्र गंगाराम और पुत्री को पाला पोसा और पढ़ाई लिखाई करवा कर शिक्षित बनाया. विद्यालयों में तत्कालीन उर्दू भाषा होने से उन्हें उर्दू में ही शिक्षा मिली. उसी में पढ़े लिखे और बड़े हुए और निजाम प्रशासन में कुछ समय काम किया, जहां पर उर्दू में सभी कार्य करना पड़ा. ऐसी जीवन यात्रा से उन्होंने ऐसी करवट बदली की हैदराबाद की स्वतंत्रता, निजाम शासन से मुक्ति और हिंदी में उनका योगदान सदा स्वर्ण अक्षरों में अंकित होना चाहिए. दरअसल, आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ” भारत भारतीयों के लिए” जय घोष का नारा लगाया था, का यह मुख्य विचार और प्रेरणा की एक राष्ट्र और एक भाषा ” हिंदी” का अनुसरण ही भारत को परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर अग्रसर करेगा. इसी को आगे बढाते हुए आर्य समाज में केवल हिंदी का प्रयोग
अधिक से अधिक होने लगा और सभी भारतीयों को एकजुट होने में एक बहुत अच्छी कड़ी साबित हुई.
हैदराबाद में आर्य समाज द्वारा शास्त्रार्थो और सम्मेलनों का आयोजन, नए आर्य समाजों की स्थापना, भाषणों, प्रवचनों व उपदेशों के माध्यम से समाज सुधार के लिए विशेष कर दलित उत्थान के लिए आर्यों की तड़प और संघर्ष ने बालक गंगाराम को बहुत आकर्षित व प्रभावित किया, इनके इन कार्यों के द्वारा वर्चस्व बढाने में / युवाओं को आकर्षित करने में आर्य समाज तेजी से आगे बढ़ रहा था. ऐसे ही आर्य समाज की कार्यकलापों से प्रभावित होकर गंगाराम जी ने सेवा कार्यों में सक्रिय भाग लेना आरंभ किया. हिंदी सीखी और अपनाई, सम्मेलनों में, प्रवचनों में, शास्त्रार्थों में, शिविरों में दिन रात नि: स्वार्थ भाव से सेवा करते. उपदेशों को श्रवण कर इनमें स्वाधीनता और हिंदी के प्रति त्याग, समर्पण, प्रेम – भाव जागृत हुआ और हैदराबाद में आर्य सत्याग्रह की बीज बोया. हिंदी का प्रभाव भी इतना गहरा रहा की, हिंदी के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो गए और जीवन भर हिंदी के प्रचार और प्रसार में लगा दिया. आपने 1940 में केशव स्मारक आर्य विद्यालय की स्थापना में पूर्ण सहयोग दिया और संस्थापक सदस्य बनकर इसकी नींव रखी, आपकी पूरी सेवाएं निस्वार्थ रही नि : स्वार्थ रही . तत्कालीन शिक्षा के क्षेत्र में उच्च कोटि की संस्था बनकर उभर आई . आपने निजाम शासन द्वारा 1946 में जबान बंदी तक विद्यार्थियों को पढाने / अध्यापन का कार्य सुचारू रूप से किया. आगे चलकर एडवोकेट बनने पर अंतरंग सदस्य के साथ- साथ कानूनी सलाहकार भी रहे. आज तक लाखों विद्यार्थियों ने यहां पर शिक्षा ली और अपना भविष्य उज्जवल बनाया.
आप केवल हिंदी में ही हस्ताक्षर करते थे , कानूनी पेपर अंग्रेजी में रहने पर भी. गंगाराम जी ने देश तथा समाज की सेवा और सम्मान के लिए अथक सेवाएं की. आपने अपना कर्तव्य निभाने के लिए दिन – रात एक कर दिया. आप निजाम राज्य आर्य प्रतिनिधि सभा के परीक्षा विभाग के लगभग 10 वर्षों तक प्रमुख रहे. सैद्धांतिक परीक्षाएं तो सभा लिया ही करती थी, लेकिन राष्ट्रभाषा हिंदी के पठन-पाठन की भी सभा की ओर से व्यवस्था की गई और परीक्षाएं भी ली जाती रही . गंगाराम जी में इस कार्य के लिए एक विशेष उत्साह तथा रुचि पाई जाती थी. इन एक-एक परीक्षाओं में 220 विद्यार्थियों तक ने भाग लिया. उस समय की परिस्थितियों को देखा जाए तो यह संख्या एक कृतिमान था. इस तरह की परीक्षाएं कुछ-कुछ अंतराल में होती रहती थी और इसका संचालन परीक्षा विभाग पंडित गंगाराम जी संभालते थे. आप का हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से भी अच्छे और मधुर संबंध रहे हैं. कई अहिंदी भाषियों को अपने हिंदी की परीक्षाओं में बैठाया / प्रेरित किया. उनकी बड़ी पुत्रवधू सुखदा भक्तराम, लातूर से संबंधित मराठी मातृभाषा होने पर सुखदा भक्तराम को प्रेमचंद स्वर्ण पदक 1984 में मिला. आपकी साहित्यिक यात्रा 1945 से आरंभ हुई . आपने हिंदी में ‘ ऋषि चरित्र प्रकाश” आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद स्टेट के अधीन प्रकाशित कर लेखन में क्रांति जागृत की और विद्यार्थियों और पाठकों में महर्षि की जीवनी बहुत सफलता पाई. इस कृति को तत्कालीन हैदराबाद शासन द्वारा जब्त कर लिया गया. ( यहां पर सूचित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है कि 80 वर्ष के बाद इसका पुनः प्रकाशन हिंदी में हुआ और अन्य भाषाओं मराठी, तेलुगू, अंग्रेजी और कन्नड़ में लगभग पूरा होने आया है) यह जीवनी आज भी उतनी ही सार्थक, सरल और आकर्षक है कि पाठकों को पढ़ने पर नई ऊर्जा और प्रेरणा मिल रही है. उच्च शिक्षा हेतु दक्षिण भारत में ” हिंदी महाविद्यालय ” की कल्पना और साकार रूप इन्होंने संस्थापक मंत्री रहकर पूरा किया. हिंदी में स्नातक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर कई केंद्रीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और बैंकों आदि में हजारों विद्यार्थियों ने अच्छा स्थान पाया है. ” दयानंद उपदेशक महाविद्यालय” मलकपेट के भी आप संस्थापक मंत्री रहे. यहां से कई वैदिक संस्कारों के उपदेशक बनकर अपनी सेवाएं अलग-अलग स्थान पर देकर उपदेश महाविद्यालय का नाम उज्जवल कर रहे हैं . बता दें कि इन सभी बड़ी-बड़ी संस्थाओं में अपना संपूर्ण योगदान प्रारंभ के पांच दस बरसों तक देकर, बड़ा होने पर, अपना पद संस्था को सौंप देते थे. किसी भी संस्था से वह चिपक कर नहीं रहे और नहीं किसी परिवार के सदस्य को बैठाया और स्वेच्छा पूर्वक अगली पीढ़ी को तैयार कर संस्थाओं को और प्रगतिशील बनने के लिए छोड़ दिया . यह एक बहुत ही प्रेरणादायक उद्धरण है. बहुत निराले ही इस तरह के उदाहरण सामाजिक संस्थाओं में हमें देखने को या सुनने को मिलते हैं आपने 40 से अधिक प्रभात वैदिक पाठशालाओं का संचालन किया, जिसमें निशुल्क प्रातः काल 2 घंटे की कक्षा समीप के मंदिरों में होती थी, हिंदी और सनातन वैदिक धर्म पर बालकों को पढ़ाया लिखाया जाता था और सूर्य नमस्कार आदि शारीरिक व्यायाम भी सिखाया जाता था. एडवोकेट होने के कारण और अत्यधिक व्यस्त रहने पर भी, हिंदी भाषा में ” वर्णाश्रम ” पहले त्रैमासिक कुछ वर्षों तक और बाद में मासिक पत्रिका का संपादन, प्रकाशन, लेखन, संपादकीय का कार्य संभालते रहे और लगभग 30 वर्षों तक इस तड़प –झड़प वाली लघु पत्रिका, गागर में सागर बनकर संपूर्ण भारतवर्ष के छोटे-छोटे कस्बों से लेकर प्रमुख शहरों में 4000 से अधिक प्रतियां प्रकाशित कर आर्य जगत में वितरण होती थी. आर्य समाज महर्षि दयानंद मार्ग, सुल्तान बाजार के द्वारा बहुत सारी प्रेरणाप्रद एवं संवेदनशील विषयों पर लघु पुस्तक प्रकाशित करवाई. जिनमें वेद ईश्वरीय ज्ञान है बाइबल या कुरान नहीं मक्का में हल्ला — हैदराबाद में दंगा. बे मां-बाप के दो करोड़ बच्चे, मंदिरों की भूमि बेचना पाप है. हैदराबाद के गणेशोत्सव करोड़ों रुपए पानी में नौबत पहाड़ – मंदिर या मस्जिद ? आदि. महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा हिंदी भाषा में लिखा गया उनका पहला ग्रंथ ” सत्यार्थ प्रकाश” की कथा बड़े ही सुंदर और सरल भाषा में अति विस्तार से श्रोताओं को सुनाना बड़ा अच्छा लगता था. उनकी यह सत्य प्रकाश की हिंदी में कथा का आयोजन आर्य समाज महर्षि दयानंद मार्ग सुल्तान बाजार और आर्य समाज किशनगंज, आर्य समाज आर्य नगर, शाहअलि बंडा में भव्य रूप से आयोजित कर कई श्रद्धालुओं के जीवन में बदलाव लाया और राष्ट्र एवं हिंदी में उसके प्रति प्रेम जागृत किया. लगभग चार दशकों तक संक्रांति मेले का आयोजन केशव मेमोरियल हाई स्कूल, नारायणगुड़ा में हुआ करता रहा, जहां पर पूरे दिन भर कई कार्यक्रम होते थे जिसमें हिंदी में कविता पाठ, हास्य व्यंग, निबंध प्रतियोगिताएं आदि होती और प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी में पुरस्कार वितरण किया जाता रहा. महर्षि दयानंद सरस्वती एवं हिंदी के परम भक्त, स्वतंत्रता सेनानी एवं हैदराबाद निजाम शासन की मुक्ति के महानायक का 91 वर्ष की आयु में 2007 में देहांत हो गया.