विलीन हो गए पंडित छन्नूलाल मिश्रा

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज पंडित छन्नूलाल मिश्रा का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया. आजमगढ़ में जन्मे पंडित छन्नूलाल ने ठुमरी और पुरब अंग को अपनी भावपूर्ण गायकी से अमर बनाया. वह किराना — बनारस घराने के प्रतिनिधि थे. उन्हें 2020 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.

वाराणसी/ नई दिल्ली/ हैदराबाद, 2 अक्टूबर 2025. वाराणसी का घाट… रंग — अबीर, गुलाल में रंगे हुए चेहरे हैं, कहीं फाग — कहानी बिरहा की गूंज है तो कहीं है छायी मदहोशी. इतने में ये सारे रंग किसी सफेद गुबार में दब जाते हैं. अब हर तरफ अलग ही सफेदी छाई है. इन्हीं के बीच में से गूंज उठता है…

लखि सुंदर फगुनी छटा के, मन से रंग– गुलाल हटा के, चिता भस्म भर झोरी दिगंबर, खेले मसाने में होली + यानी सुंदर फागुनी छटा को देखकर, मन से अलग-अलग रंगों के गुलाल हटा दिए हैं, उन्हें बस एक ही सफेदी में रंग लिया है और चीता की ऐसी सफेद भस्म की झोली भरकर दिगंबर मसान के बीच कूद पड़े हैं और जमकर होली खेल रहे हैं. इन पंक्तियों में उल्लास और अध्यात्म का जो संगम है, उसके सुंदर संयोजन की वजह अगर कोई है तो वे हैं प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक छन्नूलाल मिश्र… अपने आकार, आलाप और शब्दों के मिंड — खटक से वो ऐसा उल्लास रचते हैं कि मानों दिगंबर बाबा भोले भंडारी सच में राख रूप श्रृंगार कर बनारसी अघोरी हुरियारों के बीच चले आए हैं और सारी सृष्टि को सिर्फ अपनी दिव्य सफेदी में रंग देना चाहते हैं.

ये जादू, ये संगीत, ये दिव्य अनुभूति पैदा करने का हुनर रखते थे पंडित छन्नूलाल मिश्र…

साल 2018 में उनकी शास्त्रीय संगीत की धरोहर के रूप में एक एल्बम आई थी,’ टेसू के फूल,’ इसमें खेले मसाने में होरी… को सुना जा सकता है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में एक गांव है हरिहरपुर, यहां 3 अगस्त 1936 की एक दोपहर पंडित बद्री प्रसाद मिश्रा के घर किलकारी गूंजी. बालक हुआ है इसलिए फूल — कांसे की बड़ी-बड़ी थालियां बजाई गई और इस बड़े थाल समारोह से बालक ने ऐसे गुंजित स्वर में रूदन किया कि पिता समझ गए कि विरासत को बढ़ाने वाला आ गया है. प्यार से बालक का एक बार जो नाम पड़ा छन्नू तो वे छन्नूलाल ही हो गए. संगीत विरासत में मिला, सुर विरासत में मिले, साधना करने की शक्ति विरासत में मिली और विरासत की इस पूंजी को संभाल कर चलते हुए छन्नूलाल मिश्र वाराणसी के ओर बढे. यों समझिए कि जैसे कबीर को सीढ़ीयों पर गुरु रामानंद मिले थे, वैसे ही छन्नूलाल मिश्रा ने किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खान के पांव पखारे और उनका शिष्यत्व ग्रहण कर लिया, लेकिन भाग्य का लिखा अभी बाकी था. एक दिन युवा छन्नूलाल को गाते हुए प्रसिद्ध संगीतकार स्वर्गीय पद्म भूषण ठाकुर जयदेव सिंह ने सुना और उनकी अपार क्षमता को पहचान कर उन्हें मार्गदर्शन में ले लिया. इससे गुरु – शिष्य परंपरा का सम्मानित रूप में विकसित हुआ, जिसमें शिक्षक और शिष्य के बीच का बंधन मजबूत हुआ और पंडित जी की गायकी उस आयाम पर पहुंची, जहां गायकी गायकी नहीं रह जाती है, मंत्र बन जाती है. ऐसा मंत्र जो सिद्ध हो जाए तो बैठे-बैठे ध्यान की अवस्था में ले जाता है. पंडित छन्नूलाल मिश्रा की विरासत उनकी प्रस्तुतियों से परे विस्तारित है. वे एक समर्पित शिक्षक रहे जो विश्व भर के छात्रों को अपनी पीढ़ी और विरासत से रूबरू कराते रहे. पंडित जी अब स्मृतिशेष हैं और संगीत में जो खाली छोड़ गए हैं, वहां से ना अब कोई आलाप उठाया जा सकता है, ना कोई ताल दी जा सकती है.