कार में दो निर्वस्त्र लाश मिली, पुलिस बोली — सेक्स करते-करते मरे : लड़की के भाई का अपहरण
हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट
शिल्पी– गौतम हत्याकांड, राबड़ी के भाई ने जांच के लिए खून नहीं दिया. भाई प्रशांत का अपहरण की कहानी…..
पटना/ हैदराबाद, 10 अक्टूबर 2025. साल 1999 का. राबड़ी देवी बिहार के मुख्यमंत्री थी. 27 साल का एक लड़का गौतम सिंह, राजनीति बदलने का सपना देख रहा था. पटना के बोरिंग रोड इलाके में उसका दो मंजिला घर था. उसके पिता बीएन सिंह, मां, और छोटी बहन, सभी लंदन में रहते थे. वे बेटी को साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन गौतम ने साफ मना कर दिया था —‘ मुझे यहां कुछ करना है, पापा. राजनीति में आना है. बिहार को बदलना है.’
बीएन सिंह फोन पर कई बार समझाते,’ बेटा, यहां जिंदगी आसान है. वहां कौन तुम्हारी सुनेगा? राजनीति में सब गंदगी है.’ गौतम हर बार एक ही बात कहता,’ गंदगी को साफ करने वाला कोई होना चाहिए पापा.’ उसका सपना था– नेता बनना. शुरुआत में वह छात्र संगठनों में सक्रिय रहा. अखबारों में कभी उसका नाम छोटे नोटिस में छप जाता –‘ युवा नेता गौतम सिंह ने कॉलेज के छात्रों की समस्या पर ज्ञापन दिया.’ यही नोटिस उसकी उम्मीद को और बढ़ा देते थे. गौतम ने सुना था कि अगर किसी से राजनीतिक रास्ते खुल सकते हैं, तो वो नाम है– साधु यादव. मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के भाई. किसी परिचित के जरिए साधु यादव से उसकी मुलाकात हुई. गौतम सिंह को उम्मीद थी कि साधु यादव के जरिए उसे राजनीति में एंट्री का मौका मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पहली बार जब वह 10 सर्कुलर रोड वाले बंगले में गया, तू वहां नेताओं की भीड़ थी — किसी के हाथ में फूल, किसी के हाथ में लेटर.’ गौतम वहीं खड़ा रहा, पसीने से भीगा,’ अपनी फाइल थामे हुए. थोड़ी देर में एक आदमी बोला,’ भाई साहब व्यस्त हैं, जल्दी बोलो क्या चाहिए?’ गौतम बोला,’ नाम गौतम सिंह है. राजनीति में काम करना चाहता हूं. गांव– देहात में संगठन बना रहा हूं. उसे आदमी ने झट से जवाब दिया,’ सब चाहते हैं राजनीति में आना. पहले कुछ करके दिखाओ.’ गौतम का चेहरा उतर गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी. वो बार-बार जाता, छोटी-छोटी रैलियों में भीड़ जुटाता, तस्वीरें खींचवाता. धीरे-धीरे साधु यादव उसे पहचानने लगे. वह एक दिन फिर साधु यादव से मिलने पहुंचा.
उसे दिन साधु ने हंसते हुए कहा, ‘ तू बड़ा जिद्दी है रे गौतम. बाकी सब दो बार में गायब हो जाते हैं, तू बार-बार चला आता है.’ गौतम मुस्कुराया,’सर, बस एक मौका चाहिए. काम करके दिखाऊंगा.’ साधु ने हल्के से सिर हिलाया,’ देखते हैं, वक्त आने पर याद रखेंगे.’ यही’ देखते हैं.’ गौतम के लिए उम्मीद बन गया. वो समझ बैठा कि अब दरवाजा खुलने वाला है. 3 जुलाई 1999 नीले सूट में, कंधे पर बैग टांगे शिल्पी जैन रिक्शे पर बैठकर कोचिंग के लिए निकल रही थी. शिल्पी ‘ मिस पटना ‘ रह चुकी थी. वह गौतम की दोस्त थी. रिक्शा अभी उसके घर के कैनाल रोड के मोड पर पहुंचा ही था कि पीछे से एक सफेद मारुति कार धीरे-धीरे पास आई. अंदर से एक जानी– पहचानी आवाज आई –‘ अरे शिल्पी! रिक्शे में क्यों? मेरी गाड़ी में बैठो छोड़ देता हूं.’ वो गौतम सिंह का दोस्त था. शिल्पी को गौतम पर भरोसा था और उसके दोस्त पर भी.’ अच्छा, बस पास तक छोड़ देना,’ उसने मुस्कुराते हुए कहा और रिक्शा रुकवा दिया. वो कार में बैठ गई. शुरुआत में सब सामान्य था– कार उसी दिशा में बढ़ी, जहां शिल्पी की कोचिंग थी, लेकिन कुछ मिनट बाद, उसने देखा की रास्ता बदल गया है. गाड़ी अब शहर से बाहर की तरफ मुड़ चुकी थी.’ ये रास्ता तो नहीं है मेरे इंस्टिट्यूट का….?, उसने हैरान होकर पूछा. बगल में बैठा गौतम का दोस्त मुस्कुराया, बोला –‘ अरे, घबराओ मत. वाल्मी गेस्ट हाउस चल रहे हैं . गौतम वहीं है, उसने बुलाया है. कुछ जरूरी बात करनी है.’ शिल्पी चुप हो गई. गौतम का नाम सुनकर उसे पलभर को सुकून हुआ– सोचा शायद कोई सरप्राइज देना चाह रहा हो, लेकिन मां के अंदर कहीं एक बेचैनी थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी. गाड़ी अब गांधी मैदान पार कर चुकी थी, और शहर की हलचल पीछे छूट चुकी थी. सामने सुनसान सड़कें और बिखरे हुए पेड़ों की परछाइयां थी. दूर एक बोर्ड दिखा —‘ वाल्मी गेस्ट हाउस ‘. गेट पर गार्ड ने बिना कुछ पूछे गाड़ी अंदर जाने दी. शिल्पी उत्तरी– हाथ में पर्स था, चेहरे पर सवाल.’ गौतम कहां है?. उसने पूछा .’ अंदर,’ दोस्त ने कहा और आगे बढ़ गया. गेस्ट हाउस की दीवारें पुरानी थी, पंखे की आवाज गूंज रही थी और कमरों से आती शराब की गंध से मेहुल अजीब लग रहा था. शिल्पी कुछ पल वहीं थक गई. उधर, शहर के किसी कोने में गौतम सिंह को किसी ने बताया– ‘ शिल्पी को वाल्मी गेस्ट हाउस ले जाया गया है.’ वो सन्न रह गया.’ क्या?’ यह कहते हुए तुरंत वो अपनी गाड़ी में बैठा. उसे पता था उस गेस्ट हाउस में सिर्फ ‘ पार्टी’ होती है. गौतम का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था. उसने जैसे ही गाड़ी गेस्ट हाउस के गेट के भीतर मोड़ी, एक चौकीदार ने बिना कुछ पूछे सलामी दी — जैसे किसी खास मेहमान का इंतजार हो. गौतम ने उसकी ओर देखा भी नहीं, बस दौड़ पड़ा सीढियों की ओर. ऊपर पहली मंजिल के एक कमरे से हल्की चीख और झगड़े की आवाजें आ रही थी एक लड़की की, पहचान आने वाली. ‘ छोड़ दो मुझे! मत करो यह सब!’ गौतम की सांस रुक गई. वो दरवाजे की और भाग. दरवाजा आधा खुला था. अंदर झांका — और जो देखा, उससे उसकी रगों का खून जम गया. कमरे में शिल्पी थी — उसके कपड़े आधे फटे हुए, चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ. चारों तरफ कुछ लोग खड़े थे– वही चेहरे, जिन्हें गौतम अक्सर अपने राजनीति के दांव — पेच में देखता था. वो लोग अब जानवर बन चुके थे. गौतम ने चिल्लाकर कहा,’ रुको! छोड़ दो उसे!’ लेकिन उसकी आवाज उनकी गंदी हंसी में गुम हो गई. उसने झपटकर शिल्पी की ओर बढ़ने की कोशिश की, मगर पीछे से किसी ने उसे पकड़ लिया. बहुत हीरो बन रहा है ?. ( शेष अगले अंक में )