कानून के विरुद्ध निर्देश जारी के लिए कोर्ट को भटकाया गया,बिल्किस केस में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को किया खारिज.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार ( 8 जनवरी) को अपने फैसले में कहा कि बिलकिस बानो मामले में दोषियों को समय से पहले रिहाई के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले एक दोषी के साथ गुजरात सरकार की मिलीभगत थी. कोर्ट ने कहा कि उसे समझ नहीं आ रहा कि गुजरात सरकार ने 13 मई, 2022 के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल क्यों नहीं की . जिसमें गुजरात सरकार को एक कैदी की समय पूर्व रिहाई की याचिका पर राज्य 9 जुलाई, 1992 की नीति के अनुरूप विचार करने का निर्देश दिया गया था. हैदराबाद से तेलंगाना ब्यूरो चीफ देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट

नई दिल्ली/हैदराबाद,9 जनवरी, 2024. सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में 11 दोषियों की रिहाई का फैसला निरस्त कर दिया है. मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिलकिस बानो को न्याय पाने के लिए अलग-अलग चरणों में चार बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा . उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार ने दोषियों के साथ मिलकर काम किया और उनके पक्ष में माफी के आदेश पारित करके दोषियों के साथ मिली भगत की . यह उसका अधिकार क्षेत्र नहीं था. उसने जांच को सीबीआई को स्थानांतरित करने और मुकदमे को मुंबई में ट्रांसफर करने के सुप्रीम कोर्ट के पहले आदेश को भी निष्प्रभावी कर दिया .

गुजरात ने क्यों नहीं दायर की समीक्षा याचिका
जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्जवल भुइयां की पीठ ने राज्य सरकार से सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश की समीक्षा की मांग नहीं करने पर सवाल उठाया. जिसमें गुजरात सरकार को आरोपी की माफीनामा याचिका पर फैसला करने की अनुमति दी गई थी. जबकि गुजरात सरकार को पता था और उसने अदालत में तर्क भी दिया था कि उसके पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है. इसमें कहा गया है कि गुजरात सरकार ने माफीनामा याचिकाओं पर फैसला करके महाराष्ट्र सरकार की शक्तियां छीन ली. बेंच ने कहा कि हम यह समझने में असफल रहे कि गुजरात ने इस अदालत द्वारा पारित 13 मई, 2022 के आदेश में सुधार के लिए समीक्षा याचिका क्यों नहीं लगाई. अदालत ने कहा कि क्या राज्य ने उक्त आदेश की समीक्षा के लिए एक आवेदन लगाया था और और अदालत पर प्रभाव डाला था कि यह उपयुक्त सरकार नहीं थी. अगर ऐसा होता तो आगामी मुकदमेबाजी बिल्कुल भी नहीं होती. दूसरी ओर इस अदालत द्वारा पारित आदेश में सुधार के लिए कोई समीक्षा याचिका दायर करने के अभाव में गुजरात में महाराष्ट्र की शक्ति को ही कब्जा लिया . पीठ ने कहा कि इस अदालत के एक आदेश के आधार पर छूट के आछेपित आदेश पारित किए हैं, जो हमारे विचार में, कानून में अमान्य है .

राज्य सरकार ने की मिलीभगत
कोर्ट ने कहा कि गुजरात राज्य ने मिलीभगत से काम किया है. याचिकाकर्ता – प्रतिवादी नंबर 3 ( राधेश्याम भगवान दास शाह, दोषियों में से एक ) ने इस अदालत के समक्ष जो मांग की थी, यह वही है जो अदालत ने पिछली बार आशंका जताई थी. पीठ ने कहा कि इस मामले के पहले तीन मौकों पर सच्चाई और न्याय के हित में जांच को सीबीआई को और मुकदमे को मुंबई की विशेष अदालत में स्थानांतरित करने के लिए हस्तक्षेप किया था . लेकिन हमारे विचार में जब एक दोषी द्वारा दायर रिट याचिका में कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया था, तो इस अदालत को कानून के विपरीत और उसके द्वारा दिए गए दमन और गलत बयानों के आधार पर निर्देश जारी करने के लिए गुमराह किया गया . पीठ ने कहा कि हमारे पास इस अदालत के 13 मई, 2022 के आदेश को कानून की नजर में अमान्य और गैर मान्य माना जाना है. नतीजन गुजरात राज्य की तरफ से विवेक का प्रयोग अधिकार क्षेत्र को हड़पने और दुरुपयोग के उदाहरण के अलावा और कुछ नहीं है. इसमें कहा गया कि यह एक ऐसा मामला है जहां इस अदालत के 13 मई, 2022 के आदेश का इस्तेमाल उनके पक्ष में छूट के आदेश पारित करते समय कानून के नियम का उल्लंघन करने के लिए किया गया . 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले सीबीआई को सौंप दी थी . 1 साल बाद बिलकिस बानो की याचिका पर मुकदमा मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया . उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि गुजरात में स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है . अदालत ने 2019 में फिर से मामले में हस्तक्षेप करते हुए राज को बिलकिस बानो को मुआवजे के रूप में 50 लख रुपए का भुगतान करने का निर्देश भी दिया था.